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दूसरों को अपने स्‍वप्‍न बताने से नहीं मिला सुस्‍वप्‍नों का लाभ

दूसरों को अपने स्‍वप्‍न बताने से नहीं मिला सुस्‍वप्‍नों का लाभ

Post By : Dastak Admin on 12-Sep-2018 09:52:23

 सुचिता श्रीजी, paryushan parva


अच्छे स्वप्न देखने के बाद निद्रा नहीं लेते हुए शेष रात्रि जागकर धर्म जागरण कर प्रभुभक्ति, स्मरण करना चाहिए। स्वप्न अच्छे हो या बुरे हो कि सी को भी नहीं सुनाना चाहिए। देव, गुरु व ज्योतिष के पास जाए तो कभी खाली हाथ नही जाना चाहिए। यह बात यहां सुचिता श्रीजी ने जैन समाजजनों से कही।

पयुर्षण महापर्व के अंतर्गत चल रहे कल्पसूत्र व्याख्यान के दौरान स्वप्न फलों का विशद वर्णन करते हुए साध्वी सुचिता श्रीजी व श्रुतरेखा श्रीजी ने बताया कि अच्छे स्वप्न गुरु भगवंत के सामने सुनाकर उसका फल जानना चाहिए। गुरु भगवंत की अनुकूलता न होने पर गाय के कान में या मंदिर में जाकर परमात्मा के सम्मुख सुनाना चाहिए। अन्य कि सी के समक्ष स्वप्न की बात सुनाने से अच्छा फल देने वाला स्वप्न भी खराब फल देने वाला बन जाता है, क्योंकि सामने वाले के मन के उद्गार की प्रतिक्रिया से उसका फल प्रभावहीन हो जाता है। उन्होंने बताया धर्म के प्रभाव से कु स्वप्न भी सुस्वप्न का फल देने वाले बन जाते हैं। इसलिए धर्म के संस्कार जीवन में डालें ताकि रात्रि में कु स्वप्न हमें दिखाई ही नहीं दे। उन्होंने बताया कि शास्त्र में इस बात का उल्लेख है कि रात्रि के प्रथम पहर में देखे गए स्वप्न 12 माह में द्वितीय पहर में देखे गए स्वप्न का फल 6 माह में तृतीय पहर में देखे गए स्वप्न का 3 माह में व चतुर्थ पहर में देखे गए स्वप्न 1 माह में फल देने वाले होते हैं। इसी प्रकार सूर्योदय से 48 मिनिट पूर्व देखा गया स्वप्न 15 दिनों में तथा सूर्योदय के समय देखा गया स्वप्न तत्काल ही फल देने वाला होता है। परमात्मा महावीर जब माता त्रिशलादेवी की कु क्षि (गर्भ) में आए। तब माता 14 उत्कृष्ट महास्वप्न देखती है। इसी प्रकार वासुदेव की माता इनमें से 7 स्वप्न, बलदेव की माता 4 स्वप्न व मंडलिक की माता 1 स्वप्न देखती है। साध्वीजी ने बताया दिन के समय मनुष्य के मन में जो विचार तरंगें उठती रहती हैं। उन तरंगों के परमाणुओं का प्रभाव रात्रि के समय निंद्रा आने पर मनुष्य के मस्तिष्क पर पड़ता है। इसी कारण इन तंरगों के अनुरुप शुभ-अशुभ स्वप्न आते रहते हैं। देव, गुरु व ज्योतिष के पास हमें कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। प्राचीन काल में राजा -महाराजा से जब भेंट करने जाते थे तो उन्हें अमूल्य वस्तुएं भेंट करने के लिए साथ में ले जाते थे। इसी प्रकार हम जब भी तीन लोक के नाथ (परमात्मा) के पास जाए तो खाली हाथ नहीं जाना चाहिए

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