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आज फिर वहीँ से गुजरा

आज फिर वहीँ से गुजरा

Post By : Dastak Admin on 12-Jul-2018 23:18:48

जितेन्द्र जोशी

आज फिर वहीँ से गुजरा
जहां हम मिले थे
मुझे आज वो दोनों मिले
जो बिछड़े थे
वो गुस्साए
अलसाये
ऊब चुके
दर्द में रुके
कारवाई में लगे थे

मैं खामोश था..
नज़र दोनों की
कुछ बयाँ कर रही
छुपा रही थी कुछ
कुछ बीत गया था
बचा हुआ था
बहोत कुछ
वो नासमझ थे
मैं अब समझ रहा था
वो गुमशुदा थे
मैं अब ढूंढ रहा था
उन्हें जाना था कहीं
मुझे यहीं आना था
उनके आज को
कल आकर मुझे
फिर मनाना था
कस्मे वादे
छुअन छलावा
रातें बातें
बहोत सजाया
बस्स भी हुआ अब
वो कहते हैं
बस्स अब ना कटेगी
क्यों सहते हैं
झगड़ रहे थे
अकड़ रहे थे
देख के पानी
आँख में मेरे
कहा उन्होंने
जो नादानी
हम करते हैं
उसपे हाए
तुम क्यों रोते हो
मैंने उनका
हाथ पकड़ फिर
ये बतलाया
घूम के फिर
जब यहां आता हूँ
गुजरा हुआ कल
फिर पाता हूँ
गुज़र गया था
यहीं से मैं भी
और यहीं से
फिर एक बार
गुज़र जाता हूँ

 

Tags: जितेन्द्र जोशी

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