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सिंहस्थ् का पौराणिक महत्व

Post By : Dastak Admin on 30-Sep-2015 14:41:18

सिंहस्थ, पौराणिक, महत्व धरती पर स्वर्ग के पश्चात यदि कोई सुन्दर एवं आकर्षक नगरी है तो वह अवन्तिका नगरी है । कवि परिमल का यह कथन निश्चित ही प्राचीन धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी उज्जयिनी के विषय में सत्य ही है, क्योंकि भूतभावन भगवान महाकालेश्वर की पावन नगरी उज्जयिनी विभिन्न मंदिरों, सुरम्य घाटों, धार्मिक-सांस्कृतिक परम्पराओं और उत्सवों की नगरी है । अवन्तिका नगरी इन विविध विशेषताओं के अलावा एक महत्वपूर्ण विशेषता प्रति बारह वर्ष पश्चात् उत्तर वाहिनी पावन पुण्य शिप्रा नदी के सुरम्य तट पर आयोजित होने वाला सिंहस्थ महापर्व है । यह महापर्व सम्पूर्ण भारत वर्ष ही नहीं अपितु देश-विदेश में भी उज्जयिनी को एक विशिष्ट महत्व प्रदान करता है । वैसे तो अवन्तिका नगरी के अलावा भारत में तीन अन्य महत्वपूर्ण नगरों में भी कुंभ पर्व आयोजित होते हैं । इन नगरों में हरिद्वार, इलाहाबाद (प्रयाग) एवं नासिक सम्मिलित है । इन नगरों में क्रमशः हरिद्वार में मेष राशि में सूर्य एवं कुंभ राशि एवं वृषभ राशि में गुरु के योग से वैशाख (अप्रेल-मई) मास में कुंभ का योग बनता है, जबकि इलाहाबाद में मकर राशि में सूर्य एवं मेष राशि में गुरु के योग से माघ (जनवरी-फरवरी) मास में कुंभ पर्व आयोजित किया जाता है । इसी प्रकार नासिक में आयोजित कुंभ, सिंह राशि में गुरु एवं सिंह राशि में सूर्य के समागम पर श्रावण (जुलाई–अगस्त) मास में सम्पन्न होता है ।
    भारत वर्ष में कुंभ मनाने की इसी प्राचीन व धार्मिक परम्परा में अवन्तिका नगरी में प्रति बारह वर्ष के उपरान्त मनाया जाने वाला सिंहस्थ महापर्व अत्यंत दुर्लभ एवं मोक्षदायक माना गया है, क्योंकि हरिद्वार,   इलाहाबाद एवं नासिक में आयोजित यह महापर्व कुंभ के रूप में होते हैं जबकि उज्जयिनी में आयोजित कुंभ पर्व सिंहस्थ के रूप में होता है । उज्जयिनी में आयोजित इस महापर्व को सिंहस्थ के रूप में मनाये जाने का प्रमुख कारण है कि इस अवसर पर मेष राशि में सूर्य और सिंह राशि में गुरु का प्रवेश होता है । जिसमें उल्लेखनीय यह है कि सिंह राशि में गुरु का प्रवेश प्रति बारह वर्ष के अंतराल के पश्चात् ही होता है । अतः इसी सिंह और गुरु राशि के आकर्षक और दुर्लभ समागम के कारण ही उज्जयिनी में आयोजित कुंभ पर्व सिंहस्थ महापर्व कह जाता है । जिस प्रकार कुंभ में विशिष्ट राशियों का दुर्लभ  मेल होता है उसी प्रकार इस महापर्व में विरक्ति और सांसारिकता का भी एक आकर्षक समागम होता है ।
    उज्जयिनी में इस विशिष्ट महापर्व का आयोजन मोक्षदायिनी शिप्रा के पावन तट पर सम्पन्न होता है । लगभग एक माह तक आयोजित यह पर्व एक लघु भारत के रूप में प्राचीन परम्परा, वि लक्षण एवं समृद्ध संस्कृति और संस्कारों को अपने आप में समेटे एक वृहद् धार्मिक ऐतिहासिक महापर्व का रूप में होता है ।
    कुंभ महापर्व के विषय में यह भी कहा जाता है कि पृथ्वी लोक में चार, देव लोक में आठ कुंभ होते हैं, परन्तु फिर भी यह अवन्तिका नगरी की अनूठी माया है कि देवगण तक स्वयं भूतभावन भगवान महाका लेश्वर की पावन नगरी उज्जयिनी में आकर सिंहस्थ महापर्व के अवसर पर स्नान करते हैं एवं स्वयं को कृतार्थ करते हैं ।
    वास्तव में यह अवसर अपने आप में एक आकर्षकता लिए हुए होता है । दुर्गम जंग लों, कंदराओं और गुफाओं में सांसारिकता से परे रहकर तप–तपस्या में लीन रहने वा ले साधु–संतों के दुर्लभ  सान्निध्य से उत्पन्न आध्यात्मिक प्रभाव मानव जाति को आत्मीय शांति के अलावा ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति करा देने में भी समर्थ होता है ।
    कुंभ महापर्व के अवसर पर स्नान की महिमा विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में भी वर्णित की गई है । यह पर्व क्यों और कहाँ आयोजित किये जाते हैं इसके विषय में भी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं, जिसमें सबसे प्रमाणिक कथा देव और दानवों द्वारा किए गये समुद्र मंथन पर आधारित है । इस कथा के अनुसार अमृत प्राप्ति  के लिए जब देव और दानवों द्वारा समुद्र का मंथन किया गया तो इस मंथन में 14 रत्न के अलावा अमृत से भरा हुआ एक कलश भी प्राप्त हुआ । देवताओं ने इस अमृत कलश की रक्षा का दायित्व क्रमशः बृहस्पति, चन्द्रमा, सूर्य और शनि को सौंपा, परन्तु अपनी अजरता और अमरता के लिए व्याकुल दानवों ने इस क लश को प्राप्त करने के लिए भरसक प्रयास किये । इन विकट परिस्थितियों के परिणामस्वरूप इन्द्र पुत्र जयंत इस अमृत कलश को लेकर भागने लगे तब दानवोंने जयंत का पीछा किया, जिससे अमृत की प्राप्ति एवं रक्षा के लिए दानवों में परस्पर भयावह युद्ध लगभग बारह दिनों तक चला । देव और दानावों के मध्य हुए इस संघर्ष के कारण अमृत कलश में से कुछ बूँदे छलक कर पृथ्वी पर क्रमशः हरिद्वार, इ लाहाबाद, नासिक और उ‚ायिनी में गिरी । अमृत की इन बूँदों को इन नगरियों में प्रवाहित नदियों ने अपने आप में समाहित कर  लिया । अमृत के प्रभाव से ही वह यह नदियाँ पावन, पुण्य और मोक्षदायक बन गई ।
    अमृत कलश से छलकी बूँदों के प्रभाव के कारण हरिद्वार में गंगातट, प्रयाग में त्रिवेणी तट पर, नासिक में गोदावरी तट पर उज्जयिनी में शिप्रा तट पर कुंभ का आयोजन किया जाने लगा । कुंभ महापर्व को प्रति बारह वर्ष के अंतराल के बाद मनाये जाने के लिए पौराणिक तथ्य यह है कि देव और दानवों के मध्य अमृत कलश को लेकर बारह दिनों तक युद्ध चला । देवलोक का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर हेाता है । इसी आधार पर देवताओं के बारह दिन पृथ्वी के बारह वर्ष के समान होते है । अतः प्रति बारह वर्ष के उपरान्त कुंभ का आयोजन किये जाने की प्राचीन परम्परा विद्यमान है । कुंभ के अवसर पर किये गये स्नान जहाँपरमशक्ति में आस्था का प्रतीक है वही मोक्षमार्ग का भी अत्यंत सरल एवं सुलभ शाश्वत दिशा दर्शन है ।
    संसार में प्रत्येक मनुष्य मोक्ष एवं मुक्ति का मार्ग चाहता है, परन्तु भोग–विलास एवं विभिन्न सुख सुविधाओं से परिपूर्ण सांसारिक युग में सहज मुक्ति प्राप्त करना संभव नहीं होता क्योंकि सांसारिक सुख और सुविधाओं की तुलना में मुक्ति का मार्ग अत्यंत कठिन और दुर्गम है । अतः इस मार्ग का अनुसरण करना प्रत्येक मानव के लिए संभव नहीं होता जबकि संसार से विरक्त साधु–संत अपनी मुक्ति व परम शक्ति से एकाकार का मार्ग, तप और तपस्या के माध्यम से ढूँढ लेते हैं, परन्तु मानव मात्र के लिए यह संभव नहीं होता ।
    मानव कल्याण के लिए निर्मित समस्त प्राचीन ग्रंथ मानव मात्र की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं । इसी प्रकार हिन्दू धर्म की विविध मान्यताएँ और मनीषियों की प्रेरणा भी मानव मुक्ति पर बल देती है ।
    वैसे तो तनाव मुक्ति हेतु विभिन्न मार्ग है, परन्तु इन विविध मार्गा में सबसे सरल और सहज मार्ग पवित्र नदियों में निर्धारित समय और स्थान पर स्नान करना है । विभिन्न प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में मानव मात्र की मुक्ति के लिए स्नान की परम्परा को मोक्ष प्राप्ति  व मुक्ति का सबसे श्रेष्ठ माध्यम बताया गया है । वेदों में भी स्नान की परम्परा का वर्णन मिलता है जो स्नान के महत्व की प्राचीनता को स्पष्ट करता है ।
    मानव जाति के लिए स्नान के यह दुर्लभ योग भारत के चार प्रमुख स्थानों पर आयोजित कुंभ महापर्व के दौरान बनते हैं–
            सहस्त्र कार्तिके स्नां, माघे शतानिरच ।
            वैशाखे नर्मदा कोटिः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।।
            अश्वमेघ सहस्त्राणि, वाजपेयशतानि च ।
            लक्षप्रदक्षिणा भूम्यां कुंभ स्नानेन तत्फलम् ।।
    अर्थात् हजारोंस्नान कार्तिक मास में, सैकड़ों स्नान माघ मास में किये जाये या वैशाख मास में करोड़ों बार नर्मदा स्नान किये जाये तो भी इतना पुण्यफल नहीं मिलता, जितना एक बार कुंभ स्नान से मिलता है । कुंभ के स्नान की प्रासंगिकता के विषय में प्राचीन ग्रंथों में यहाँ तक कहा गया है कि हजारों अश्वमेघ, सैकड़ों वाजपेय यज्ञ तथा लाखों प्रदक्षिणा करने के पश्चात् जो फल प्राप्त होता है वही फल मात्र कुंभ के दौरान पवित्र नदियों  में स्नान करने से स्वतः ही प्राप्त हो जाता है ।
    भारत के चार प्रमुख स्थानों पर यह कुंभ आयोजित किये जाते हैं । इन स्थानों में से एक पवित्र स्थान उज्जयिनी है । स्कंदपुराण में उज्जयिनी स्थित शिप्रा नदी को अत्यंत पापनाशक एवं मोक्षदायिनी माना गया है । यजुर्वेद में यह वर्णित है कि शिप्रा भगवान शिवजी द्वारा गिराए गये रक्त के रूपमें अवन्तिका में प्रवाहित होती है ।
उज्जयिनी में प्रति बारह वर्ष के उपरान्त सिंहस्थ का आयोजन सम्पन्न होता है । इस महापर्व के दौरान शिप्रा नदी में स्नान अत्यंत पापनाशक एवं मुक्तिकारण माना गया है, क्योंकि इस महापर्व के दौरान 1. अवंतिका नगरी, 2. वैशाख मास, 3. शुक्ल पक्ष, 4. सिंह राशि में गुरु, 4. मेष राशि में सूर्य, 6. तुला राशि में चन्द्र, 7. स्वाति नक्षत्र, 8. पूर्णिमा,  9. व्यतिपात योग, 10. सोमवार जैसे दस महायोग बनते हैं । यहाँ एक बात अत्यंत आकर्षक है कि इन दस योगों में से अधिकांश योग तो प्रतिवर्ष बन जाते हैं, परन्तु सिंह राशि में बृहस्पति का योग प्रत्येक बारह वर्ष के पश्चात् ही बनता है । अतः उज्जयिनी में आयोजित कुंभ महापर्व सिंहस्थ के रूप में मनाया जाता है ।
    इस अवसर पर सम्पूर्ण देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु आकर नगर की गरिमा व गौरव में वृद्धि करते हैं तथा विलक्षण साधु–संतों के सानिध्य में पावन पुण्य शिप्रा नदी में स्नान कर स्वयं को कृतार्थ करते है । अवंतिका नगरी में आयोजित यह सिंहस्थ महापर्व इतना विलक्षण होता है कि साधारण मानव एवं असाधारण साधु–संतों के अलावा देवलोक से देवगण भी आकर पावन पुष्य शिप्रा  नदी में स्नान कर स्वयं को अभिभूत करते हैं ।

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