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उज्जैन : पौराणिक नगरी

Post By : Dastak Admin on 20-Oct-2015 13:33:22

उज्जैन : पौराणिक नगरी
उज्जैन यानी उज्जयिनी अपने अनादि, पुरातनता, उच्च स्तरीय धार्मिक महत्व, वैदिक, पौराणिक महत्व, अबूझ इतिहास सांस्कृतिक  विभिन्नता, भौगो लिक  स्थिति, तंत्र-मंत्र स्थ ल, उच्च स्तरीय शैक्षणिक  केन्द्र, राजनीतिक  विरासत, व्यापारिक  केन्द्र, प्रधान शिक्षा केन्द्र, साहित्य में सौन्दर्यपूर्ण तथा महान ऐतिहासिक  यात्रियों की रुचि का केन्द्र होने से अपने आप ही भारत की ही नहीं विश्व की सर्वाधिक  पुरातन नगरियों में से एक  वही जा सकती है ।
    उज्जैन की अतिविशिष्ट नगरी होने के संकेत तथा प्रतीक  चिन्ह, विभिन्न ग्रन्थों, शोधपत्रों, कतिपय पुरातात्विक  प्रमाण मि लते हैं । रामायण तथा महाभारत का ल में भी इस नगरी के अतिविशिष्ट होने के संकेत उप लब्ध हैं । सामान्य रूप में प्राप्त पुरातात्विक  प्रमाणों के अनुसार ईसा पूर्व 6वीं से 7वीं शताब्दी से भी पुरातन नगरी उज्जयिनी सुस्पष्टत: सिद्ध है ।
    धार्मिक  नगरी के रूप में उज्जयिनी 3 भागों में विभक्त  है । उत्तरीय भाग ब्रह्मा का (का लियादेह, बह्मकुण्ड एवं सि द्धवट), मध्यम विष्णु का (अंकपात, विष्णु सागर, पुरुषोत्तम मंदिर, वैष्णव अखाड़े), दक्षिणी भाग शिव का (महाका ल मंदिर, रुद्रसागर, शैव अखाड़े)। इस प्रकार एक  नगरी में हिन्दू धर्म के तीनों देवताओं का उज्जैन नगरी को तीन हिस्सों के रूप में विभक्त  करके प्रतिष्ठित होना अपने आप में अनूठा, अभूतपूर्व तथा रोमांचक  है ।
    सनातन (हिन्दू धर्म) में 5 देव ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश तथा शक्ति  प्रमुख होकर "पंचदेव' के रूप में विख्यात हैं । उज्जैन के परिप्रेक्ष्य में ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) की प्रतिष्ठा ऊपर वर्णित है । शक्ति, हरसिद्धिगढ़का लिका, नगरकोट की महारानी तथा विभिन्न मातृकाओं के रूप में उज्जैन में विराजित हैं तथा सीताजी द्वारा स्थापित षष्ठ गणेशचिंतामण, मंछामन, स्थिरमन, अवि¿नविनायक तथा महाका ल मंदिर में स्थापित गणेश एवं इसके अ लावा चकतीर्थ, श्मशान में स्थित गणेश मंदिर स्वयं ही उज्जैन में गणेशजी की विशिष्ट आराधना को दर्शाता है । उक्त  से स्पष्ट है कि  सनातन धर्म के प्रमुख 5 देवताओं के विराजित होने के साथ ही पूजा की जीवन्त परम्परा से भी ""उज्जयिनी'' सनातन धर्म एवं भारत का परिपूर्ण तथा उच्चतम तीर्थ स्थ ल है ।
    सूर्य मंदिर का लियादेह में स्थित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि  यहाँ कभी बड़ा सूर्य मंदिर था । इसके अ लावा पुरातन प्रमाण कायथा में भी सूर्यमूर्ति तथा पूजा के साथ ही सूर्य पूजक  वराहमिहिर वंशज ब्रह्माणों से मि लते हैं । इस प्रकार सूर्यदेव की प्रतिष्ठा भी उज्जैन में पुरातन समय से स्वयंसि द्ध रही है । इस प्रकार उज्जैन पुरातन आर्य धार्मिक  परम्परा का भी वाहक  सि द्ध होता है ।
    उज्जैन का भारतीय धार्मिक  साहित्य में मात्र भारत अथवा पृथ्वी ही नहीं अन्तरिक्ष का ""अक्षकेन्द्र'' भी मान्य किये जाने के संकेत किये गये हैं  ।
    इस बात में कोई दो मत नहीं है कि  पुरातन भारतीय महर्षि याने ऋषिमुनि योग, ध्यान आदि प्रक्रियाओं से अपने सूक्ष्म मस्तिष्क को असामान्य रूप से जाग्रत करते थे । जिसे कुण्ड लिनी जागरण भी कहा जा सकता है । इस प्रकार अपनी असीमित मानसिक  शक्तियों से विशा ल अन्तरिक्ष के गूढ़ अन्तरिक्ष रहस्यों को पढ़ने की क्षमता इन महर्षियों में थी । अपनी इस अद्भुत मस्तिष्कीय क्षमता के आधार पर ही अंतरिक्ष एवं सौरमण्ड लीय परिक्षेत्रों को राशि, नक्षत्र, आकाश गंगा आदि भागों में सुस्पष्ट  रूप से विभक्त  करने में हमारे महर्षि सफ ल हुए । इन सभी ने मि लकर उज्जैन को का लगणना का केन्द्र भी निर्धारित किया । सामान्य का ल गणना ही नहीं पृथ्वी के बार-बार प्र लय में समाहित होकर पुन: प्रकट होने को का ल गणना केन्द्र इस उज्जयिनी नगरी को मान्य किया जाता है । वर्तमान में 84 महादेव, 84 कल्प यानी पृथ्वी के पुन: ज ल प्र लय के उपरान्त प्रकट होने से समय को निर्धारित करते हैं । यह भी मान्यता है कि  ज ल प्र लय पर उज्जयिनी प्रभावित नहीं होती यानी डूबती नहीं है । महाका ल मंदिर में स्थापित ""अनादिकल्पेश्वरशिव लिंग'' इस सन्दर्भ के प्रतीक  चिन्ह मान्य किये जाते हैं । स्कन्दपुराण में स्पष्ट  उल् लेख है -  ""का लचक प्रवर्तको महाका ल: प्रतापण: ।''
    पुरातन भारतीय संवत् "विकम संवत्' का प्रादुर्भाव भी उज्जैन से ही हुआ है । इसके साथ ही उज्जैन की भौगो लिक  स्थिति पूर्व में देश का नाभि क्षेत्र उज्जैन को मान्य किया जाता रहा है । नाभिदेशे महाका ल स्तन्नाम्ना तत्र वै हर:। वर्तमान में मनीषी नोब ल पुरस्कार प्राप्त विजेता अर्थात् अमत्र्य सेन का सुस्पष्ट कहना है कि  ग्रीनविच के स्थान पर उज्जैन को समय की गणना स्थ ल रखा जाना चाहिए । राजा जयसिंह द्वारा 4 स्थ लों वेधशा ला में से एक  का निर्माण भी उज्जैन में इसके भौगो लिक  महत्व को ध्यान में रखते हुए कराया गया था । उज्जैन में ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) की मात्र स्थापना है ही इसके साथ ही अपितु इन स्थापना के साथ ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के सर्वाधिक प्रिय स्थ लों के रूप में इस नगरी का वर्णन पुराणों में आता है । ब्रह्मा, विष्णु, महेश के अ लावा सप्तर्षियों एवं अन्य मनीषियों का उज्जैन से सम्बन्ध होना उज्जैन को अन्य तीर्थ स्थ लों से विशेष सि द्ध करता है । गयाकोटा में स्थित सप्तऋषि मंदिर सह ऋषि मंदिरमहाका ल मंदिर में सप्तऋषियों के मन्दिरों का होना ही उज्जैन की विशेषता दर्शाता ही है । इसके साथ ही श्रा द्ध एवं तर्पण हेतु 3 प्रमुख स्थ ल सिद्धनाथ, गयाकोटा तथा रामघाट  पर पिण्ड दान की पुरानी परम्परा अपने आप में उज्जैन को अद्भुत स्थ ल सि द्ध करती है । गयाकोटा में श्राद्ध तथा तर्पण के महत्व को ध्यान में रखते हुए वर्तमान का ल में भी देश एवं विदेश से हजारों श्र द्धा लु श्रा द्ध पक्ष में गयाकोटा उज्जैन में अपने पुरखों के श्रा द्ध एवं तर्पण के  लिए आते हैं । पुरातन समय से सिद्धनाथ पर श्र द्धा लुओं के कु ल एवं पते के साथ आगमन का इतिहास  लिखा जाना तथा स्वयं उज्जैन के प्राचीन महत्व को सि द्ध करता है ।
    द्वादश ज्योतिर् लिंगों में से एक  महाका ल, 52 शक्ति पीठों में से एक  हरसिद्धिसप्तपुरियों में से एक  अवन्तिका, पुरातन 4 प्रमुख कुंभ स्थ लों में से एक  उज्जयिनी, 12 शक्तियों में से 1 गढ़का लिका, 9 नारायणों का स्थ ल, षष्ठ गणेश का स्थ ल, मातृकाओं का स्थ ल, भैरव स्थ ल, श्मशान स्थ ल, वल् लभाचार्य जी की बैठक, पाशुपत सम्प्रदाय की प्रमुख स्थ ली, नाथ सम्प्रदाय के सर्वोच्च गुरु मत्स्येन्द्रनाथ की कर्मस्थ ली होने से उज्जैन के धार्मिक  महत्व का वर्णन शब्दों की सीमा में बाँधना  लगभग असम्भव ही है ।
    भारत की सर्वाधिक  पवित्र नदियों में से एक  ""क्षिप्रामा लवांच ल की गंगा'' का ""उत्तर वाहिनी'' अंश तीर्थों में सर्वोच्च स्तर पर उज्जयिनी को  ले जाता है । क्षिप्रा सर्वत्र पुण्यास्ते बह्महत्यापहारिणी एवं - क्षिप्रादेवनामपि दुर् लभा । नी लगंगा, गन्धवती नदी, चन्द्रभागा (सोमवती), क्षाता जैसी प्राचीन पवित्र नदियों से पोषित यह क्षिप्रा माँ, धार्मिक  पवित्रता की ऊँचाइयों को छूती है । क्षिप्रा की महत्ता विष्णु से उत्पन्न होने की मान्यता के कारण विष्णुद्यवा, वराहावतार से उत्पन्न वराहतनया, कामधेनु से उत्पन्नकामधेनुसमुद्यवा, विष्णु एवं शिव की सर्वोच्च शक्ति  यानी चक्र और पाशुपत की शिक्त  से उत्पन्न पीड़ा (ज्वर) को समाप्त करने की क्षमता के कारण ज्वर¿नी के साथ ही नाग लोक  में क्षिप्रा ज ल को कुण्डों में भरने के उपरान्त उन कुण्डों का अमृत से पुन: भर जाना तथा क्षिप्रा का अमृतोद्यवा नामकरण होना अपने आप में क्षिप्रा की सर्वोच्च महत्ता को दर्शाता है ।
    ज्योतिषीय दृष्टिकोण से उज्जैन का महत्व अपनी भौगो लिक  स्थिति तथा धार्मिक  उच्चता से स्वयं सिद्ध सौरमण्ड लीय ग्रहों में से ज्योतिष दृष्टिकोण सर्वाधिक  महत्व प्राप्त ग्रहों के स्थान उज्जैन में सुनिश्चित प्रतीत होते हैं ः–
1.    सूर्यका लियादेह स्थित सूर्य मंदिर
2.    चन्द्रमासोमतीर्थ
3.    मंग लनाथ मंदिर
4.    गुरु (बृहस्पति) - प्राचीन बृहस्पति मंदिर, गो लामंड़ी
5.    शनि नवग्रह मंदिर - त्रिवेणी
6    राहू - का लभैरव

    बुध, शुक्र एवं केतु मात्र के स्थ ल सुस्पष्ट नहीं है । कतिपय स्थ लों पर विद्वानों का मत है कि  पूर्व में समस्त नवग्रहों के पूजा स्थ ल भी उज्जैन में स्थित रहे हैं । त्रिवेणी स्थित शनि नवगह मंदिर में समस्त नवग्रह स्थापित भी हैं । वर्तमान समस्त नवग्रहों के स्थ ल उज्जैन में उप लब्ध भ ले न हो परन्तु सप्ताह के प्रत्येक  वार के दर्शन हेतु यहाँ स्पष्ट  स्थ ल निर्दिष्ट है -
1.    सोमवार - महाका ल
2.    मंग लवार - मंग लनाथ
3.    बुधवार - चिन्तामण गणेश
4.    गुरुवार - बृहस्पति मंदिर
5.    शुकवार - गज लक्ष्मी या संतोषी माता मंदिर
6.    शनिवार - त्रिवेणी, अनन्त पेठ, ढाबा रोड  स्थित शनि मंदिर
7.    रविवार - सूर्य मंदिर (का लियादेह) या का लभैरव दर्शन

    ज्योतिषीय दृष्टिकोण से नाभिक्षेत्र एवं शिव नगरी होने से ग्रहीय समस्या एवं कुण्ड ली में स्थित दुर्योगों से होने वा ली समस्याओं संबंधी उपायों का श्रेष्ठ केन्द्र उज्जैन को माना जाता है । उज्जैन को फ लित ज्योतिष के अन्तर्गत मंग ल दोष, पितृ दोष तथा का लसर्प दोष एवं अन्य कई दोषों का निवारण का प्रमुख स्थ ल मान्य किये जाने के साथ ही उज्जैन में इन दोषों के निवारण स्थ ल पर निर्धारित किया जाना प्रतीत होता है ।
    तंत्र-मंत्र के दृष्टिकोण में उज्जैन को सुदूरपूर्व स्थित बंगा ल यानी दक्षिणेश्वरी महाका ली क लकत्तावासिनी एवं कामाख्या देवी, गोहाटी के समकक्ष ही सम्पूर्ण भारतवर्ष में मान्यता प्राप्त है । तंत्र-मंत्र सि द्धि के सम्बन्ध में महाका ल का अपने कपा ल पात्र को उज्जयिनी में फेंकना, स्वयं देवी की कोहनी गिरकर शक्तिपीठ प्रसि द्ध होकर ''हरसिद्धि'' नाम धारण कर सर्व सिद्धिदायक  के रूप में विख्यात होना ही उज्जैन को तांत्रिक  केन्द्र के रूप में स्थापित करने के  लिए पर्याप्त है । गढ़का लिका, भूखीमाता, चौसठ  योगिनी, पाता ल भैरवी, महा लाया-महामाया का मातृकाओं के रूप में उज्जैन में स्थित होना, का लभैरव, अद्र्धका लभैरव, विकान्त भैरव का उज्जैन में स्थान होना, पाशुपत सम्प्रदाय के  लकु लिश द्वारा स्थापना, नाथ सम्प्रदाय का प्रादुर्भाव, मत्स्येन्द्रनाथ की समाधि तथा भर्तृहरि की गुफाएँ, तंत्र मंत्र के सम्बन्ध में उज्जैन को पूरे आर्यावर्त में एक  उच्च स्थ ल पर पदस्थ करते हैं । भूखी माता, हरसिद्धिमहामाया, महा लाया आदि देवियों को ब लि देने का बारबार उल् लेख मि लता रहता है । वर्तमान में का लभैरव को सुरापान या शासन की ''सुराधार'' से नगर पूजा उज्जैन के तांत्रिक  पीठ  होने को सि द्ध करते हैं ।
    नृसिंह घाट, चक्रतीर्थ, ओख लेश्वर तथा विक्रान्त भैरव तथा मत्स्येन्द्रनाथ की समाधि पर क लकत्ता एवं आसपास से आये तांत्रिकगणों को मि लना भी आम बात है । तांत्रिकों द्वारा बताया जाता है कि  क लकत्ता एवं असम की कामाख्या देवी मंदिर में तांत्रिकी सि द्धि प्राप्त करने के उपरान्त उज्जैन में आकर एवं कतिपय तांत्रिक  क्रियाओं को करने के उपरान्त ही सि द्धि की पूर्णता प्राप्त की जा सकती है । इस पूर्णता का शिव के  ''अर् द्धनारीश्वर'' रूप में समझा जा सकता है । क लकत्ता एवं गोहाटी आदि शक्ति  के स्थ ल है तथा उज्जयिनी कापा लिक  महाका ल तांत्रिक  का स्थ ल हैं । अत: जब तक तांत्रिक  क्रियाओं में दोनों का संयुक्तिकरण नहीं होगा तब तक  तांत्रिक  पूर्णता भी अप्राप्त रहेगी । वर्तमान में भी विश्वप्रसि द्ध डबरा ल बाबा तथा अन्य कुछ  तांत्रिकी विद्याओं को जानने वा ले महानुभव उज्जैन में मि ल जाते हैं ।
    कृष्ण के द्वारा मथुरा से उज्जैन आकर 14 विद्याएँ 64 क लाओं का ज्ञान गुरु सान्दीपनि से प्राप्त करना स्वयं उज्जैन के शैक्षणिक  वैभव एवं महान ज्ञान केन्द्र को दर्शाता है । 12वीं शताब्दी के पूर्व एक  बड़े विश्वविद्या लय का उज्जैन नगर में होना पाया जाता है । राजा भोज स्वयं के साथ ही वराहमिहिर, वात्स्यायन आदि विद्वानों द्वारा विभिन्न शा द्धों की रचना एवं टीका उज्जैन को अपने आप में देश के सतत सर्वोच्च शैक्षणिक  केन्द्र में पदस्थ करती है । विभिन्न ग्रन्थों एवं किताबों को पढ़ने से यह संकेत प्राप्त होते हैं कि  वास्तुशा द्ध, काव्यशा द्ध, नाट्यशा द्ध, व्याकरण, गणित, रसायनशा द्ध, ज्योतिषशा द्ध आदि में से कई शा द्धों का वैज्ञानिक  रूप में प्रस्तुतीकरण या उØव केन्द्र प्राचीन उज्जैन को माना जा सकता है। यह शोध का विषय भी है । यह मान्यता भी है कि  शून्य का आविष्कार उज्जैन में ही हुआ है और शून्य के आविष्कार से अनन्त संख्या की कल्पना भी उज्जैन में मान्य की जाती है ।
    बेता ल पच्चीसी तथा सिंहासन बत्तीसी की कथाएँ उज्जैन को रहस्यमयी तांत्रिक-मांत्रिकी एवं वैज्ञानिक  दृष्टिकोण से गहन विषयक  निरूपित करती हैं ।
भौगो लिक  स्थिति
वर्तमान उज्जयिनी 75ं5ं पूर्व देशान्तर व 23ं11ं उत्तर अक्षांश पर क्षिप्रा नदी के दाहिने तट पर स्थित है । उज्जयिनी चम्ब ल की सहायक  नदी क्षिप्रा के पूर्व तट पर समुद्र त ल से 1698 फीट  की ऊँचाई पर स्थित है । पुरातत्व नगरी वर्तमान उज्जैन से 2 मी ल उत्तर की ओर थी । इसके संबंध में यह कहा जाता है कि  इसे भूकम्प तथा क्षिप्रा की असाधारण बाढ ने नष्ट कर दिया था। जयनगरी उज्जयिनी भारतीय इतिहास को गौरवमय बनाने वा ले प्रभावशा ली राजनैतिक  एवं सांस्कृतिक  केन्द्र मे से एक  है । बनारस तथा मथुरा के समान शाश्वत नगरी होने का सम्मान इसे प्राप्त है और टाइनर नदी के तट पर स्थित प्रसि द्ध सप्त गिरिन्द्रों के नगरी रोम से तथा सारोन की खाड़ी के समीपस्थ नी ल- लोहित पुष्प-किरीट  शोभित नगर से उसकी तु लना की जा सकती है ।
    प्रद्योत एवं वासवदत्ता, अशोक  तथा मुंज, रूद्रदमन, नवसाहसांक  और भोज, सवाई जयसिंह तथा महादजी शिन्दे की स्मृतियों के प्रभामण्ड ल से उज्जयिनी दीप्तिमान है । यह उस विक्रमादित्य की राजधानी थी जिसे पारम्परिक  विक्रम संवत् से सम्ब द्ध करती है । इसी में उन सभ्यताओं का आयोजन हुआ था जिनमें का लिदास, उमर एवं पÙगुप्त ने कीर्ति प्राप्त की थी । भारतीय ज्योतिर्विदों की प्रथम मध्यान्ह रेखा का यह स्थान है । विक्रमादित्य की यह राजधानी सदा से भारत की सातपवित्र नगरियों में गिनी जाती है  -    अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्तिका ।
        पुरी, द्वारावती सदैव
सप्तैत मोक्षदायिका ।।
    महाका लेश्वर के संबंध में कहा गया है -
        आकाशे तारकं  लिंगं, पाता ले हाटकेश्वर ।
        मृत्यु लोक  महाका लं, त्रय  लिंगं नमोस्तुते ।।

    आकाश में तारकेश्वर, पाता ल में हाटकेश्वर और मृत्यु लोक  में महाका लेश्वर है जो उज्जैन ही में विराजमान हैं । महाका लेश्वर प्रसि द्ध द्वादश ज्योतिर् लिंगों में एक  है । इसकी पावनता स्कन्दपुराण के आवन्तिका खण्ड में इस प्रकार वर्णित किया है-     
       तस्मा द्धिकरं क्षेत्रं करुणां वै सुरोत्मा:।
        तस्माद्शगुणं मनये प्रयागं तीर्थ मुत्तमम् ।।
        तस्माद्शगुणा काशी काश्या दशगुणा गया ।
        ततो दशगुणा प्रोक्ता कुशस्थ ली च पुण्यदा ।।

    वर्तमान उज्जैन नगरी नागाधिराज विन्ध्य के मनोरम अंच ल में पुण्य स लि ला ऐतिहासिक एवं धार्मिक  शिप्रा नदी के पूर्व तट पर अवस्थित है । यहाँ का ज लवायु अत्यन्त मधुर समशीतोष्ण है । उज्जैन की प्रधान बो ली मा लवी है, जो अवन्ति से उत्पन्न है । हिन्दी और मराठी का यहाँ पर्याप्त प्रचार है । व्यापार उद्योग इस नगरी में विविध हैं । अतीत में रूईकपास का यह केन्द्र था । कपड़ा मि लें, जिनिंगप्रेस, फैक्ट्री, ते ल, आटा, कपड़ा, होजयरी आदि बड़े-बड़े कारखाने थे । उज्जैन भारत के मध्य भाग में है, अतएव वह इस विशा ल राष्ट­ के öदय स्थान पर है । जिस प्रकार भौगौ लिक  दृष्टि  से अवन्ति भारत के देश के मध्यम में है, उसी प्रकार मानव शरीर में अध्यात्मिक  देशप्रतिष्ठा की योजना के अनुसार वह नाभिस्थान (शरीरमध्य) में प्रतिष्ठित मानी गई है ।
    पौराणिक  महत्व के अतिरिक्त  उज्जैन का वैज्ञानिक  जगत में भी स्वतन्त्र महत्व ह ै। प्राचीन भारतीय मान्यता के अनुसार जब उत्तर ध्रुव की स्थिति पर 21 मार्च से प्राय: 6 मास का दिन होने  लगता है तब 6 मास के तीन माह होने के पüात सूर्य दक्षिण क्षितिज से बहुत दूर हो जाता है । उस समय सूर्य ठीक  उज्जैन के मस्तक  पर होता है । उज्जैन का अक्षांश व सूर्य की परम कांति दोनों ही 24 अक्षांश पर मानी गई । सूर्य के ठीक  नीचे की स्थिति उज्जयिनी के अ लावा संसार के किसी नगर की नहीं रही ।
    इसी लिए प्राचीन का ल से उज्जयिनी को भौगो लिक  व प्राकृतिक  दृष्टि से महत्व प्राप्त होता था । खगो ल एवं भौगो लिक  गणना के अनुसार  लंका सुमेरु पर्वत जो मध्य देशान्तर रेखा, वह उज्जैन के ऊपर से होकर गई है । भारत की का ल गणना का माध्यम उज्जैन ही रहा है । इसी कारण प्राचीन भारत में उज्जयिनी को ग्रीनविच माना गया । जिस प्रकार खगो लशा द्ध में उज्जयिनी सूर्य के मस्तक  पर ठीक  नीचे आता है । उसी प्रकार भौगो लिक  स्थिति में भी सारे देश का मध्यवर्त केन्द्र बिन्दु उज्जैन है । इस लिए उज्जयिनी को देश का नाभि क्षेत्र कहा गया है ।
    नगर के बाø प्रदेश में यहाँ महाका ल (शिव) और चिरसंगिनी, मंग ल चण्डी (दुर्गा का रूप विशेष) का प्रसि द्ध मंदिर । ये मंग ल चण्ड़ी शिक्त  संगम तंत्र में इस प्रकार उल् लिखित अवन्ति देश की का लिका ही होगी -
उज्जयिन्यां कुर्परज मांगल्य: कपि लांवर: ।
भैरव: सि द्धि: साक्षादेवी मंग लचण्डिका ।।
अवन्ती संज्ञको देश: का लिका तत्र तिष्ठति ।।

    प्राचीन नगरी की भूमि पर प्राचीनता आज भी दिखाई देती है और यहाँ पुरातत्व की असंख्य वस्तुएँ, रत्न, अक्ष, मुद्रा, आभूषण तथा सिक्के प्राप्त हुए हैं । वर्तमान नगर आयताकार है और कभी गो ल शिखरों वा ले प्रस्तर प्रकार से परिवेष्ठित था जिसको मा लवा के सुल्तानों के द्वारा ईस्वी 15वीं शताब्दी में निर्मित होना बताया जाता है; किन्तु मा लकम के समय में ही इस प्राचीर के अनेक  भाग ध्वस्त हो गये थे । 1810 ई में राजधानी का स्थान उज्जैन से परिवर्तन होकर ग्वा लियर के समीप  लश्कर हो जाने के कारण प्रसि द्ध शिन्दे राजवंश ग्वा लियर च ला गया । सबसे अधिक  महत्वपूर्ण भाग जयपुर के महाराज सवाई जयसिंह द्वारा स्थापित जयसिंहपुरा है, जो 1733-1743 तक  मा लवा सूबे के शासक  थे । शिया मुस लमानों के एक  भाग बोहराओं के नाम पर बोहरा बाख ल तथा कोट या कि ला जो सम्भवत: संस्कृत साहित्य में प्रसि द्ध महाका ल वन के स्थ ल का संकेत करता है । जयसिंहपुरा में वैज्ञानिक  अध्ययन में रुचि रखने वा ले जयपुर के सवाई महाराज द्वारा निर्मित वेधशा ला है ।
    उज्जैन का पुरातत्वीय परिक्षेत्र अभी तक  हुए उत्खनन से प्राप्त सामग्री तथा मुद्राओं को वर्णित किया गया है, जिनके द्वारा परिक्षेत्र की सांस्कृतिक  गरिमा सम्बन्धी साहित्यिक  उल् लेखों की सम्पुष्टि की गयी है । उज्जयिनी भारत के प्राचीनतम नगरों में से एक  उज्जयिनी परिक्षेत्र के सांस्कृतिक  स्वरूप की सम्पुष्टि  हेतु परिक्षेत्र में है । यद्यपि यह कहना कठिन है कि  युगदृष्टा ऋषियों के का ल में इस प्रकार तथा कंगूरे वर्तमान थे, तथापि यह असंदिग्ध सत्य है कि  महाभारतकार महाका ल के प्रांगण से तथा कोटितीर्थ (निश्चित रूप से उज्जयिनी का)से, जिसका उल् लेख वे नर्मदा, दक्षिण सिंधु, चर्मण्वती तथा पश्चिम भारत के अन्य तीर्थस्थ लों के संबंध में करते है,परिचित थे ।
महाका लं ततो गच्छेत् नियतो नियताशन: ।
कोटितीर्थ मुपस्पृश्य ध्यमेधफ लं  लभेत ।।

    इसी तारतम्य में यह भी कहा जा सकता है कि  का लिदास, बाण तथा सोमदेव के ग्रन्थों में उज्जयिनी के महाका ल के महत्वपूर्ण उल् लेख प्राप्त होते हैं । रामायण अवन्ति से परिचित है, जो उज्जयिनी के समीप के प्रदेश का नाम ही नहीं है,वरन स्वयं नगरी के नाम के रूप में उल् लिखित है ।
    हिन्दू धर्म में तीर्थ यात्रा के  लिए चार प्रमुख धाम चार दिशाओं में स्थित होना वर्णित है । उत्तर में बद्रीनाथ, पूर्व में जगन्नाथपुरी,दक्षिण में रामेश्वर व पश्चिम में द्वारकापुरी है, किन्तु इन सब तीर्थों में उज्जयिनी को प्रमुख माना गया है और इसी कारण यह महातीर्थ कह लाता है । इसका कारण यह है कि  यह भारत वर्ष के मध्य अर्थात नाभि स्थान पर स्थित है । भारत में तीर्थ यात्रा का प्रारम्भ तथा समाप्ति उज्जैन के महातीर्थ से ही होती है । इस नाभिदेश का स्वामी महाका लेश्वर को बताया गया है । जहाँ मानव  लोक  के स्वामी महाका ल हो, वह देश महान है ।


 

 

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कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से फाल्गुन पूर्णिमा तक

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प्रात: 4 बजे श्रावण मास में प्रात: 3 बजे

प्रातः 4 से 6 बजे तक।

दध्योदन

प्रात: 7 से 7:45 तक

प्रात: 7:30 से 8:15 तक

महाभोग

प्रात: 10 से 10:45 तक

प्रात: 10:30 से 11:15 तक

सांध्य

संध्या 5 से 5:45 तक

संध्या 5 से 5:45 बजे तक

सांध्य

संध्या 7 से 7:45 तक

संध्या 6:30 से 7:15 तक

शयन

रात्रि 10:30 बजे

रात्रि 10:30 से 11 बजे तक

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    जीवन ठहराव और गति के बीच का संतुलन है । - ओशो

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