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मोक्षदायिका शिप्रा नदी

Post By : Dastak Admin on 23-Oct-2015 13:59:51

वैदिक ऋषियों ने नदियों की वन्दना में ऋचाएँ लिखी हैं । हमारा इतिहास नदियों के प्रवाह से रचा गया इतिहास है और उनके तट हमारी परंपरा के विकास की कहानी कहते हैं । शिप्रा भी मानव के जीवन का पर्याय है । वह किसी पर्वत के गौमुख से नहीं, धरा गर्भ से प्रस्तुतित हाकर धरातल पर बहती है । इसलिए वह लोकसरिता है । इसके प्रभाव में हमारे लोकजीवन के सुख और दुरूख के स्वर घुले मिले हैं । अपने आराध्य महाकाल का युगों से अभिषेक  करते यह हमारी आस्था की केंद्र बन गयी है । हर बारह साल बाद इसके तटों पर जब आस्था का महामेला सिंहस्थ कुम्भ महापर्व के रूप में सजता है तो यह साधना,तपस्र्या और पवित्रता के उ्योषक  के रूप में हमारे मानस को फिर जागृत करने लगती है ।चर्मण्वती जिसे आज चम्बल कहा जाता हैए शिप्रा इसकी सहायक  नदी है । मार्केण्डेय पुराण में इन दोनों नदियों का उल्लेख आता है । स्कन्दपुराण के अनुसार शिप्रा उत्तरगामी है और उत्तर में बहते हुए ही चम्बल में जा मिलती है । शिप्रा का उल्लेख यजुर्वेद में भी है । वहाँ शिप्रावतः पत्रःश् कहते हुए वैदिक  ऋषियों ने शिप्रा का स्मरण किया है । इसका उल्लेख महाभारत, भागवतपुराण, ब्रह्मपुराण, अग्निपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण तथा वामनपुराण में भी है । शिप्रा की महिमा का संस्कृत साहित्य में खूब उल्लेख है । महाकवि कालिदास ने क्षिप्रा का काव्यमंच उल्लेख करते हुए लिखा है .श्शिप्रावतः प्रियतम इव प्रार्थना चाटुकारःश्और महर्षि वशिड्ढ ने शिप्रा स्नान को मोक्षदायक  मानते हुए शिप्रा और महाकाल की वन्दना इन शब्दों में की है .
            महाकाल श्री क्षिप्रा गतिसदैव सुनिर्मला ।
            उज्जयिन्यां विशालाक्षि वासः कस्य न रोचते ।।
            स्नानं कृत्वा नरो यस्तु महान् धामहि दुर्लभम् ।
            महाकालं नमस्कृत्य नरो मृत्युं न शोचते ।।

    एक किंवदंती के अनुसार उज्जयिनी में अत्रि ऋषि ने तीन हजार साल तक  कठोर तपस्या की । इस दौरान उन्होंने अपने हाथों को ऊपर ही उठाए रखा । अपनी तपस्या पूर्ण होने के बाद जब उन्होंने अपने नेत्र खोले तब देखा कि  उनके शरीर से प्रकाश के दो स्त्रोत प्रवाहित हो रहे हैं पहला आकाश की ओर गया और चन्द्रमा बन गया और दूसरे ने जमीन पर क्षिप्रा नदी का रूप धारण किया । शिप्रा को सोमवती के नाम से भी जाना जाता है ।

    एक  रोचक  कथा यह भी है कि  एक  बार जब महाकालेश्वर को भूख लगी तो उसे शान्त करने के लिए उन्होंने भिक्षा माँगने का निस्य किया । बहुत दिनों तक  जब उन्हें भिक्षा नही मिली तब उन्होंने भगवान विष्णु से भिक्षा चाही । विष्णु ने उन्हें अपनी तर्जनी दिखा दी । इस पर शंकर ने क्रोधित होकर उस तर्जनी को त्रिशूल से भेद दिया । उस अंगुली से र क्त  प्रवाहित होने लगा तब शिव ने उसके नीचे कपाल कर दिया । कपाल के भर जाने पर जब वह नीचे प्रवाहित होने लगा उसी से शिप्रा जन्मी ।
    अनेक  कथाओं की जननी ऐसी शिप्रा ने उज्जयिनी को तीन तरफ से घेर रखा है। वह दक्षिण . पूर्व छोर से नगर में प्रवेश करती है । फिर वह हर स्थान व मोड़ पर मनोहारी दृश्य स्थापित कर लेती है । त्रिवेणी का तट  हो या चिन्तामण गणेश की ओर जाने का मार्गए वहाँ शिप्रा की सुन्दर भंगिमा के दर्शन होते हैं । महाकाल तथा हरसिद्धि के आशीर्वाद से वह अभिशि क्त  होती है और भगवान महाकाल के समक्ष उसकी उत्ताल तरंगें मानो नर्तन करती हैं और दुर्गादास की छत्री की ओर बढ़ते हुए वह चक्रतीर्थ पर काशी के मणिकर्णिका घाट का स्मरण कराती है । वह भर्तृहरि गुफा, मछिन्दर, गढ़कालिका और कालभैरव क्षेत्र को पार कर सांदीपनि आश्रम और राम जनार्दन मंदिर को निहार कर मंगलनाथ पहुँचती हैं तथा इस मार्ग में वह गंगाघाट से गुजरती है। आगे बढ़कर वह स्यिवट की ओर मुड़ती है और फिर कालियादेह महल को घेरती हैं । क्षिप्रा का यह रूप युगों से तपस्वियों को आकर्षित करते आया है और ये तट  इतिहास में अमर हो गए हैं । क्षिप्रा के किनारे 28 प्रमुख तीर्थ है । इनमे कर्कराज, नृसिंह तीर्थ, पिशाचमु क्ति तीर्थ, गन्धर्व तीर्थ, केदार तीर्थ, सोमतीर्थ, चकतीर्थ, कालभैरव तीर्थ, मंगल तीर्थ और शि क्त भेद तीर्थ मुख्य हैं ।

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