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ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर मंदिर

Post By : Dastak Admin on 31-Oct-2015 14:26:22

 

     भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का स्थान प्रमुख है । तांत्रिक  परम्परा में मात्र महाकाल को ही दक्षिण मूर्ति पूजा का महत्व प्राप्त है ।  वर्तमान मंदिर तीन भाग में है सबसे नीचे श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग उसके ऊपर श्री ओंकारेश्वर एवं सबसे ऊपर श्री नागचंद्रेश्वर है । श्री महाकालेश्वर मंदिर के दक्षिण दिशा में श्री वृद्धमहाकालेश्वर एवं श्री सप्तऋषि के मंदिर हैं ।
    इस मंदिर का वर्णन महाभारत,स्कन्दपुराण, वराहपुराण, नृसिंहपुराण, शिवपुराण, भागवत्, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में तथा कथासरित्सागर, राजतरंगिणी, कादम्बरी, मेघदूत, रघुवंश आदि काव्यों में इस देवालय का अत्यन्त सुन्दर वर्णन दिया गया है। अलबरूनी व फरिश्ता ने भी इस देवालय का सुन्दर वर्णन किया है । पुराणकारों के कथनानुसार विश्वकर्मा ने श्री महाकालेश्वर के निवासार्थ एक  भव्य मंदिर का निर्माण किया, चारों ओर एक  परकोटा खिंचवाया । उस मंदिर के महाद्वार पर एक  बड़ा भारी घण्टा स्वर्ण श्रृखला से लटकता था और मंदिर में सर्वत्र रत्न खचित दीपस्तम्भ थे जिन पर रत्नजड़ित दीप प्रकाशित होते थे ।
    परमार नरेशों के अभिलेखोंका प्रारम्भ ही शिव स्तुति से होता है । परमार शासकों का व्यक्तिगत धर्म शैव धर्म होने के कारण जनता में शैव धर्म का प्रचार.प्रसार अधिक  हुआ । परमार नरेश वाक्पति राज द्वितीय की उज्जयिनी ताम्र पट्टिका से ज्ञात होता है कि  उन्होंने भवानीपति की आराधना की व उज्जयिनी में शिवकुण्ड का निर्माण करवाया । परमार नरेश उदयादित्य ने महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाकर मंदिर में नाग बंध अभिलेख उत्कीर्ण करवाया । परमार नरेश नरवर्मन के महाकाल अभिलेख से ज्ञात होता है कि  उसने उज्जयिनी में शिव मंदिर का निर्माण करवाया था ।
    श्री महाकालेश्वर मंदिर के नीचे सभा मण्डप से लगा हुआ एक  कुण्ड है जो कोटितीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है । सभा मण्डप में एक राम मंदिर है । जिसके पीछे अवंतिका देवी की प्रतिमा है । श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रात 4 बजे होने वाली भस्मारती विशेष दर्शनीय है । भस्मारती में सम्पूर्ण जीवन के जन्म से लेकर मोक्ष तक  के दर्शन की कल्पना की जा सकती है । मंदिर खुलने का समय प्रातरू 4 बजे से रात्रि 11 बजे तक  है । त्रिलोकी तीन अवतारों में मृत्युलोक  में श्री महाकालेश्वर का अद्वितीय अवतार हैं ।
    मालववंशीय विक्रमादित्य के विषय में जो आख्यान से प्रतीत होता है कि इस राजा ने महाकालेश्वर का स्वर्ण शिखरसुशोभित बड़ा मंदिर बनवाया । उसके लिए अनेक  अलंकार तथा चँवर, वितानादि राजचि समर्पित किए । इसके बाद ई सं ग्वारहवीं शताब्दी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार परमार वंश के भोजराजा ने करवाया था । ई सं1265 में दिल्ली के सुलतान शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने इस मंदिर को तुड़वाकर महाकाल का लिंग कोटितीर्थ में फिकवा दिया ।
    इस घटना के 500 वर्षां पश्चात् जब उज्जैन पर राणोजीराव शिन्दे का अधिकार हुआए उस समय उनके दीवान रामचन्द्रबाबा ने उसी स्थान पर महाकालेश्वर का मंदिर फिर से बनवाया जो आज भी स्थित है । मंदिर के अन्दर श्री महाकालेश्वर के पश्चिम,उत्तर और पूर्व की ओर क्रमश गणेश, गिरिजा और षडानन की मूर्तियाँ स्थापित हैं । दक्षिण की ओर गर्भगृह के बाहर नन्दीकेश्वर विराजमान हैं । लिंग विशाल है और सुन्दर नागवेष्टित रजत जलाधारी में विराजमान हैं । बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकालेश्वर ही दक्षिणमुखी मंदिर है । उसके समीप आसपास षटांगण मे स्वप्नेश्वर महादेव, बद्रीनारायण जी, नृसिंह जी, साक्षी गोपाल तथा अनादि कालेश्वर के भी मंदिर हैं ।
    महाकालेश्वर के सभामण्डप में ही एक  राम मंदिर है । राम मंदिर के पीछे अवन्तिका देवी की प्रतिमा है, जो इस अवन्तिका की अधिष्ठात्री देवी हैं । नागपंचमी पर महाकाल मंदिर के ऊपर विराजित नागचन्द्रेश्वर के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं । भगवान महाकालेश्वर की आरती दिन में पाँच बार होती है। श्रावणमास के सभी सोमवारों और भादों मास के दो सोमवारों के दिन नगर में महाकालेश्वर की भव्य रजत प्रतिमा की सवारी निकाली जाती है । सवारी मंदिर से निकलकर पहले क्षिप्रा तट पर जाती है । वहाँ पूजन के पश्चात नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए यथा स्थान पहुँच जाती है । श्रावण मास में काँवड़ यात्रियों की सुविधा के कारण विशेष व्यवस्था होती है ।
    श्री महाकालेश्वर प्रसादी व्यवस्थाके अंतर्गत महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति द्वारा तीन प्रकार के प्रसाद तैयार कराकर विक्रय किया जाता है,सूखे मेवा, बेसन लड्डू, चिरौंजी । अमानती सामान पट.नि:शुल्क रहता है ।
    भूतभावन भगवान महाकाल की वर्षभर मे कईसवारियाँ निकाली जाती हैं। सभी सवारियों में प्रशासन की ओर से पुलिस व्यवस्था, प्राचीन राज्य के प्रतीक चोपदार, पुरोहित एवं श्रद्धालुजन सम्मिलित रहते हैं। ये सवारियाँ निश्चित् समय शाम चार बजे निकलती हैं। ये सवारियाँ हैः-
1     सावन,भादों की 6 सवारियाँ कभी 7, जिसमें एक  शाही सवारी अंतिम सवारी जो भाद्रपद कृष्ण पक्ष के अन्तिम  सोमवार को निकलती है।
2    कार्तिक  माह की सवारी
3    दशहरा मैदान तक  दशहरा के दिन सभी पूजन के लिए ।
4    बैकुण्ठ चौदस कार्तिक  शुक्ल चतुर्दशी को रात्रि 11 बजे गोपाल मंदिर तक यह एकमात्र सवारी रात्रि को निकलती है।
5    उमा साँझी सवारी
    ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का विभिन्न अवसरों पर निम्नलिखित आकर्षक  श्रृगार किया जाता है। यह श्रृगार दर्शनीय होता है ।  श्रामण माह में, शिवरात्रि को,  नागपंचमी पर्व पर । भांग पूजा और भात पूजा भी होती है ।
    शिवरात्रि के दूसरे दिवस दोपहर 12 बजे भस्मारती की जाती है । यह दिन में होने वाली एक मात्र भस्मारती है । कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी, रूप चौदस के दिन महाकालेश्वर में विशेष अन्नकूट का आयोजन होता है । इसके अलावा महाकालेश्वर मंदिर में अनेक  विभिन्न उल्लेखनीय गतिविधियाँ आयोजित होती हैं जो निम्नानुसार हैः-
हरिहर मिलापहरि विष्णु और हर शिव का मिलाप
    श्रावण महोत्सवः महाकाल मंदिर समिति द्वारा श्रावण भाद्रपद के सोमवार से पहले अर्थात् रविवार की शाम को सांस्कृतिक  आयोजन करवाया जाता है । जिसमें देश के ख्यातिनाम शाद्धीय गायक, वादक  भागीदारी करते हैं एवं शाद्धीय नृत्य का आयोजन भी होता है ।

उमा.महेश्वर व्रत
    साँझी उत्सव मालवा की परम्परानुसार यह उत्सव आयोजित होता है ।
नाग पंचमीः वर्ष में 1 बार खुलने वाले नागचंद्रेश्वर मंदिर में दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालुओं की कतार लगती है ।
    महाकालेश्वर मंदिर में भूतभावन ज्योर्तिलिंग की पूजा अर्चन के लिए 16 पुजारी प्रशासन द्वारा नियुक्त  हैं । भस्मारती के नेम्नूकदार 4 परिवार 8 पुजारी हैं, इसके अतिरिक्त  बाह्मण पुरोहित जो सभा मण्डप में विराजित होते हैं, पूजन अर्चन करवाने के लिए अधिकृत हैं । 16 पुजारी में एक  पुजारी मुख्य पुजारी होता है ।
    पुजारियों को महाकालेश्वर मंदिर संस्थान द्वारा वेतन दिया जाता है, जबकि  पुरोहितों को पूजनअर्चन करवाने की रसीद का 75 प्रतिशत मिलता है । शेष 25 प्रतिशत मंदिर के विकास में खर्च किया जाता है । मंदिर प्रवेश द्वार से पूजन की रसीद कटवाने पर ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर के विविध पूजन निम्नानुसार करवाया जा सकता है .
पूजन
1    सामान्य पूजा
2    अभिषेक  महिम्न स्त्रोत
3    रुद्राभिषेक  वैदिक  पूजा
4    रुद्राभिषेक  ग्यारह दर्शना वैदिक  पूजा
5   लघु रूद्र
6    महारुद्र रुद्राभिषेक 11 एक दर्शना वैदिक पूजा


कालभैरव
    शैव पूजा में अष्ट्रदृभैरवों का भी महत्व माना गया है । काल भैरव इनमें सर्वप्रमुख है । स्कन्द पुराण के अवन्तिखण्ड में काल भैरव के मंदिर का उल्लेख मिलता है ।
    प्राचीन परम्परा के अनुसार कापालिक तथा अघोर मत के अनुयायी शिव अथवा भैरव की आराधना करते थे । इन पंथों की साधना का संबंध उज्जयिनी से भी रहा है । काल भैरव की पूजा में लोग सुरा भी अर्पित करते हैं । कहा जाता है कि भद्रसेन नाम के किसी राजा ने इस मंदिर का निर्माण कराया था । परमार काल में यह विशाल मंदिर रहा होगा । यहाँ पर शिव, पार्वती, विष्णु और श्री गणेश की परमारकालीन प्रतिमाएँ प्राप्त हुई है । प्राचीन मंदिरों के अंशोंसे इस मंदिर का पुनर्निर्माण भी किया जाता रहा है ।
    इस मंदिर में मालवदृशैली के सुंदर चित्र भी अंकित किये गए थे । मंदिर के प्रांगण में दांयी ओर बिर्लि मंदिर तथा बांयी ओर धर्मशाला है ।

हरसिद्धि
    उज्जयिनी के प्रमुख मंदिरोंमें हरसिद्धि मंदिर की गणना होती है । महालक्ष्मी और महासरस्वती की मूर्तियों के मध्य माँ अन्नपूर्णा की मूर्ति गहरे सिन्दूरी रंग में पूती हुई है । इस मंदिर में श्री यंत्र भी प्रतिष्ठित है ।
    शिव पुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती को यज्ञ कुण्ड मेंउठाकर जब शिव जी जा रहे थे, तब सती की कोहनी इस स्थान पर गिरी थी । तांत्रिक परम्परा में इस स्थान को सिद्धपीठ माना गया है । स्कन्द पुराण के अनुसार दैत्योंका संहार करने के कारण देवी का नाम हरसिद्धि प्रसिद्ध हुआ । लोक परम्परा के अनुसार हरसिद्धि सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी थी ।
    मंदिर का पुनर्निर्माण मराठाकाल मेंहुआ और प्रांगण में दोनों दीप स्तंभ विशिष्ट्र मराठा कृति है । मंदिर के प्रांगण में एक प्राचीन बावड़ी और एक छोटा सा मंदिर है, जिसमें महामाया की प्रतिमा है ।

वेधशाला
    इस वेधशाला का निर्माण सवाई राजा जयसिंह द्वारा सन् 1725 ई. से 1730 ई. के मध्य किया गया था । राजा जयसिंह ने इसी प्रकार की चार अन्य वेधशालाओं का निर्माण दिल्ली, जयपुर, मथुरा तथा वाराणसी में भी करवाया था । इस वेधशाला में सम्राट् यंत्र, नाडी वलय यंत्र, दिगंश यंत्र तथा याम्योत्तर भित्ति यंत्र प्रमुख उपकरण है । इन यंत्रों से ग्रह नक्षत्रों के वृत्त एवं संक्रमण का अध्ययन किया जाता रहा है । इसी कारण लोग इसे यन्त्र महल भी कहते हैं ।
    इस वेधशाला का जीर्णोद्धार सन् 1923 ई. में भूतपूर्व ग्वालियर के तत्कालीक महाराजा माधवराव सिंधिया द्वारा करवाया गया था । शिक्षा विभाग के अंतर्गत इस वेधशाला में ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन आज भी किया जाता है । प्रतिवर्ष ग्रहों की दैनिक गति एवम् स्थिति दर्शक पत्रिका प्रकाशित की जाती है । इस प्रकार राजा जयसिंह द्वारा निर्मित वेधशालाओं में यही एकमात्र वेधशाला हैए जहाँ खगोलीय अध्ययन के लिए आज भी इन यंत्रों का प्रयोग किया जाता है ।

सांदीपनि आश्रम
    पौराणिक परम्परा के अनुसार कुलगुरु सांदीपनि के आश्रम में योगेश्वर कृष्ण एवं उनके मित्र सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की थी । महाभारत श्रीमद्भागवत, ब्रह्मपुराण, अग्निपुराण तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में सांदीपनि आश्रम का उल्लेख मिलता है । इस क्षेत्र में पुरातात्विक प्रमाण के रूप में तीन हजार वर्ष पुराने चित्रित धूसर पात्र मिले हैं, जिनका संबंध महाभारत काल से माना जा सकता है । ये पात्र हस्तिनापुर, इन्द्रपस्थ, मथुरा, अहिच्छत्रा और कौशाम्बी से प्राप्त अवशेषों से मिलतेदृजुलते हैं ।
    आश्रम का प्राचीन जलस्त्रोत गोमती कुण्ड है, जिसका पुराणोंमें भी उल्लेख मिलता है । कुण्ड के पास खड़े नंदी की प्रतिमा दर्शनीय है, जो शुंगकालीन है । निकट का क्षेत्र अंकपात कहलाता है । जनश्रुति के आधार पर कृष्ण अपने अंक लेखन की पट्टिका यहाँ साफ करते थे । सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में इस आश्रम के पास श्री वल्लभाचार्य ने धार्मिक प्रवचन किया था । उस स्थान पर आचार्य द्वारा लगाया हुआ पीपल का वृक्ष है, जिसका किसी नरोत्तम शर्मा को दिया गया प्रशस्ति पत्र है । वल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी श्री वल्लभाचार्य की चौरासी बैठकों में से इस स्थान को महाप्रभुजी की तिहत्तरवी बैठक मानते हैं ।

चिंतामन गणेश
    चिंतामण गणेश का यह स्थान अत्यंत प्राचीन है । गणेश की प्रतिमा के साथ रिद्धि.सिद्धि की प्रतिष्ठा की गई है । लोक परम्परा में इसे चिंताहरण गणेश का स्थान माना जाता है । चैत्र मास के प्रत्येक बुधवार को यहाँ दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं । मंदिर में सभा मण्डप के कलापूर्ण स्तंभ परमारकालीन है । इस मंदिर का पुनर्निर्माण अहिल्या देवी होलकर ने करवाया और मंदिर के सामने एक कुण्ड और परकोटा भी बनवाया था ।

त्रिवेणी.नवग्रह शनि मंदिर
    क्षिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट पर नवग्रह का यह मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है । त्रिवेणी घाट के पास शिप्रा नदी पर संगम है । इस नदी का नाम पास ही इंदौर शहर में बाणगंगा है । कुछ लोग इस नदी को तुंगभद्रा भी मानते हैं । त्रिवेणी संगम की कल्पना के साथ अदृश्य नदी सरस्वती की पौराणिक मान्यता भी इस स्थान के साथ जुड़ी हुई है ।
    शनीचरी अमावस्या पर नवग्रह मंदिर पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं । इस स्थान का धार्मिक महत्व वर्तमान युग में बढ़ता गया है, यद्यपि पुरातन संदर्भा में इस स्थान का विशेष उल्लेख प्राप्त नहीं होता है ।

मंगलनाथ
    मत्स्यपुराण के अनुसार यह मंगल ग्रह का जन्म स्थान है । मंदिर के सामने बहती क्षिप्रा का दृश्य अत्यंत सुंदर है । दर्शनार्थ विशेषकर मंगलवार को यहाँ बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं । टेकरी पर स्थित यह स्थान आसपास के क्षेत्र में सबसे ऊँचा स्थान है ।
    प्राचीनकाल में यह स्थान मंगलग्रह के दर्शन के लिए प्रसिद्ध था । ज्योतिष विद्या के अध्ययन के लिए उज्जैनमहत्वपूर्ण केन्द्र रहा है । मंगल ग्रह के अध्ययन के लिए परम्परा से प्रसिद्ध इस स्थान का धार्मिक महत्व आज भी जनभावना में सुरक्षित है । इस मंदिर में महादेव की पूजा की जाती है ।

सिद्धवट
    उज्जैनका सिद्धवट प्रयाग के अक्षयवटए वृंदावन के वंशीवट तथा नासिक के पंचवट के समान अपनी पवित्रता के लिए प्रसिद्ध है । पुण्य सलिला क्षिप्रा के सिद्धवट घाट पर अंत्येष्ठि.संस्कार सम्पन्न किया जाता है । स्कन्द पुराण में इस स्थान को प्रेत.शिला तीर्थ कहा गया है । एक मान्यता के अनुसार पार्वती ने यहाँ तपस्या की थी । यह नाथ सम्प्रदाय का भी पूजा स्थान रहा है ।
    सिद्धवट के तट पर क्षिप्रा में अनेक कछुए पाए जाते हैं । उत्तसिनी के प्राचीन सिक्कों पर नदी के साथ कूर्म भी अंकित पाए गए हैं । इससे भी यह प्रमाणित होता है कि यहाँ कछुए अति प्राचीनकाल से ही मिलते रहे होंगे । कहा जाता है कि कभी इस वट को कटवाकर इस पर लोहे के तवों को जड़ दिया गया था, परन्तु यह वृक्ष तवों को फोड़कर पुनः हरादृभरा हो गया ।

गोपाल मंदिर
    महाराजा दौलतराव शिंदे की धर्मपत्नी बायजाबाई शिंदे ने अपने आराध्य देव गोपाल कृष्ण का यह मंदिर उन्नीसवी शताब्दी में बनवाया था । यह मंदिर मराठा स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण है । इस मंदिर के गर्भगृह में गोपाल कृष्ण के अलावा शिव, पार्वती, गरुड़ और बायजाबाई की प्रतिमाएँ भी है ।
    इस मंदिर के गर्भगृह में सुसज्जितचांदी का द्वार विशेष दर्शनीय है । कहा जाता है कि यह द्वार सोमनाथ के प्रसिद्ध मंदिर से गजनी ले जाया गया था । वहाँ से मुहम्मद शाह अब्दाली इसे लाहौर लाया था । महादजी सिंधिया ने उसे प्राप्त किया और इस मंदिर में उसी द्वार की पुनः प्रतिष्ठा की गई है ।

नगरकोट की रानी का मंदिर
    स्थूल रूप से यह प्रतीत होता है कि नगरकोट के परकोटे की रक्षिका देवी है । मंदिर परमारकालीन है । अवंति खंड में वर्णित नौ मातृकाओं में से सातवीं कोटरी देवी है । दोनों नवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष नवरात्रि उत्सव मानाया जाता है ।
    

चौबीस खम्बा माता मंदिर
    श्री महाकालेश्वर मंदिर के पास से पटनी बाजार की ओर जाने वाले मार्ग पर यह पुरातन द्वार चौबीस खम्बा कहलाता है । यह द्वार बहुत प्राचीन है । यहाँ पर 12वीं शताब्दी का एक शिलालेख लगा हुआ था उसमें लिखा था कि अनहीलपट्टन के राजा ने अवंति में व्यापार करने के लिए नागर व चतुर्वेदी व्यापारियों को यहाँ लाकर बसाया था ।

गढ़कालिका मंदिर
    यह मंदिर कालिका देवी को समर्पित है जो हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार बहुत शक्तिशाली देवी है । कालजयी कवि कालिदास गढ़ कालिका देवी के उपासक थे । कालिदास के संबंध मेंमान्यता है कि जब से वे इस मंदिर में पूजा.अर्चन करने लगे तभी से उनके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण होने लगा ।

इस्कॉन मंदिर
    इस्कॉन एक अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था है । जिसकी स्थापना कृपामूर्ति श्रीमद् अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुवाद ने सन् 1966 मेंन्यूयॉर्क शहर मेंकी । अंग्रेजी में इसे International Society for Krishna Consciousness अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ कहते हैं । विश्व के लगभग सभी देशों में इस्कॉन ने अपने केन्द्र खोल रखे है ।

पीर मत्स्येन्द्रनाथ
    भर्तृहरि गुफा के चारों ओर का क्षेत्र प्राचीन उज्जैनक्षेत्र था । पुरातत्वीय उत्खनन से प्राप्त अवशेष इसकी प्राचीनता सिद्ध करते हैं । यहीं पर पीर मत्स्येन्द्रनाथ की समाधि है । नवनाथों के प्रमुख मत्स्येन्द्रनाथ थे । नाथ सम्प्रदाय के संतों को पीर कहा जाता है अतः मत्स्येन्द्रनाथ को पीर कहा जाता है ।

श्री रामजनार्दन मंदिर
    प्राचीन विष्णु सागर के तट पर स्थित यह विशाल परकोटे से घिरा मंदिर समूह है । इसमें एक राम मंदिर है और दूसरा जनार्दन विष्णु का मंदिर है । इसे सवाई राजा एवं मालवा के सूबेदार जयसिंह ने बनवाया था । परकोटा तथा कुण्ड मराठाकाल में निर्मित हुए । होल्कर महारानी अहिल्या बाई ने इसका जीर्णोद्धार कराया था ।

श्री चित्रगुप्त धर्मराज मंदिर
    रामजनार्दन मंदिर के निकट कायस्थ समाज का महत्वपूर्ण तीर्थ है। पद्मपुराण के पाताल खंड के अनुसार चित्रगुप्त ने ब्रह्मा के आदेश से उज्जैनके शिप्रा तट के नगर कोट में तपस्या की थी ।

भर्तृहरि गुफा
    उज्जयिनी की सांस्कृतिक प्राचीन परम्परा में भर्तृहरि एक महत्वपूर्ण नरेश, तपस्वी एवं लेखक रहे हैं । यह स्थान बड़ा शांत और रम्य है । यह क्षिप्रा के किनारे गढ़कालिका मंदिर से 1 किमी आगे है । भर्तृहरि राजा विक्रमादित्य के ज्येष्ठ भ्राता थे ।

कालियादेह महल (सूर्य मंदिर)
    भैरवगढ़ से 3 मील उत्तर में यह महल सूर्य मंदिर व प्रेत पीड़ा से मुक्तिदाता, बावन कुण्ड कालियादेह महल के नाम से भी जाना जाता है । सूर्य अर्थात् कालप्रिय देव ही आज कालियादेह कहलाता है । इससे स्पष्ट है कि यह पौराणिक देवता सूर्य का प्राचीन स्थान रहा होगा ।

विक्रम विश्वविद्यालय
    उज्जैनअपनी प्राचीन समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है । प्राचीन समय से ही अध्ययन का केन्द्र बना रहा है । इसलिए स्वतंत्रता के बाद प्रदेश की सम्मानित हस्तियोंने केन्द्र सरकार से उज्जैनमें विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए आग्रह किया । उज्जैनके सम्राट विक्रमादित्य के नाम से विक्रम विश्वविद्यालय की स्थापना की गई ।
कालिदास अकादमी
    मध्यप्रदेश शासनए संस्कृति विभाग के सौजन्य से कालिदास अकादमी की स्थापना उज्जैनमें सन् 1978 में हुई । वर्ष 1982 से अकादमी अपने निजी भवन में संचालित होने लगा । महाकवि कालिदास समूची सांस्कृतिक परम्परा एवं भारतीय चेतना के प्रतीक है ।

उज्जैनके अन्य दर्शनीय स्थल
    रुद्रसागर का मध्यवर्त टापू विक्रांत भैरव त्रिवेणी.नवग्रह शनि मंदिर गेबी हनुमान मंदिर श्री राम मंदिर श्री योगमाया मंदिर महाराजवाड़ा अनंत नारायण का मंदिर रंजीत हनुमान मंदिर ।

उज्जैन के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग नई दिल्ली के अधीन स्मारक
1     वैश्या टेकरी सन्दर्भः विक्रम स्मृति ग्रंथ
2     कुम्हार टेकरी
म.प्र. पुरातत्व विभाग मण्प्रण् शासन के अधीन स्मारक

1    चौबीस खम्बा माता मंदिर
2     विष्णु चतुष्टिका
3     वीर दुर्गादास की छत्री
4     तिलकेश्वर महादेव मंदिर
 

 

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महाकाल आरती समय

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  महाकाल आरती समय

आरती

चैत्र से आश्विन तक

कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से फाल्गुन पूर्णिमा तक

भस्मार्ती

प्रात: 4 बजे श्रावण मास में प्रात: 3 बजे

प्रातः 4 से 6 बजे तक।

दध्योदन

प्रात: 7 से 7:45 तक

प्रात: 7:30 से 8:15 तक

महाभोग

प्रात: 10 से 10:45 तक

प्रात: 10:30 से 11:15 तक

सांध्य

संध्या 5 से 5:45 तक

संध्या 5 से 5:45 बजे तक

सांध्य

संध्या 7 से 7:45 तक

संध्या 6:30 से 7:15 तक

शयन

रात्रि 10:30 बजे

रात्रि 10:30 से 11 बजे तक

आज का विचार

    मनुष्य को हमेशा मौका नही ढूंढना चाहिये, क्योंकि जो आज है वही सबसे अच्छा मौका है। - अज्ञात

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