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उज्जैनः चौरासी महादेव मंदिर

Post By : Dastak Admin on 31-Oct-2015 14:54:29

कहा जाता है कि उज्जयिनी का प्रत्येक कंकर शंकर का स्वरूप है । भारत के सर्वज्ञात द्वादस ज्योतिर्लिंगों में से एक महालोकेश भगवान महाकालेश्वर तो यहाँ अनंतकाल से विराजित है । स्कन्दपुराण के अवंतिखण्ड में वर्णित चौरासी महादेव का अपना अलग ही माहात्म्य है । इस आलेख में इन्हीं की महिमा को संजोया गया है ।
    भारत में बारह स्थानों पर शिव के प्रधान लिंग है । उनमें से एक महाकाल का ज्योतिर्लिंग शिप्रा तट स्थित उज्जयिनी में है । महाकाल की इस नगरी का महत्व इसलिए भी है कि यहाँ पर पाँच वस्तु.श्मशानए उरवरए क्षेत्रए हरसिद्धि पीठ तथा वन एक ही स्थान पर हैए जो अन्यत्र दुर्लभ है । इस महा ज्योतिर्लिंग की स्थापना कब हुई इस विषय में इतिहास मौन है । उदयादित्य परमार ने महाकाल के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था । परमार युग के अंतिम दिनों में देवपाल के शासन काल में सन् 1235 ईण् में दिल्ली के दासवंशी सुलतान शमसुद्दीन अल्तमश ने महाकाल के मंदिर को तोड़ दिया था तथा यहाँ रखी विक्रमादित्य की सोने की मूर्ति को ले गया था । मराठा काल मेंराणोजी सिंधिया के दीवान रामचन्द्र बाबा शेणवी ने इस ध्वस्त महाकाल के मंदिर का जीर्णोद्धार किया तथा पुनः ज्योतिर्लिंगों की प्राणदृप्रतिष्ठा की ।
    महाकाल की नगरी के अतिरिक्त अनेक शिवलिंग है । उनमें से 84 लिंग का माहात्म्य माना गया है तथा उनका वर्णन स्कन्दपुराण के अवंतिका क्षेत्र माहात्म्य में अलग ही अध्याय में किया गया है । स्कन्द पुराण के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इन 84 महादेव में से क्रमांक 1 से 26 तक महाकाल के आसपास स्थित वन मेंए क्रमांंक 27 से 65 तक प्राचीन उज्जयिनी अर्थात् गढ़कालिकाए भैरवगढ़ तथा मकोड़िया आम क्षेत्र मेंए क्रमांक 65 से 71 तक शिप्रा तट पर क्रमांक 81 से 84 तक उज्जैननगरी के चारों द्वारों पर पूर्वए दक्षिणए पश्चिम तथा उत्तर में क्रमशः पिंगलेश्वरए कोकलाखेड़ीए अंबोदिया और जैथल में थेए परन्तु काल के थपेड़ों से इनमें से कई मंदिर नष्ट्र हो गये । मराठा काल में उन्हें अन्य स्थानों पर जैसे सिंहपुरीए कार्तिक चौकए दानीगेटए अनन्तपीठए खत्रीवाड़ाए सराफाए डाबरी आदि में स्थापित कर दिया गया ।
    एक बाद नारदजी स्वर्ग में गए । वहाँ बातचीत के सिलसिले में उन्होंने महाकाल की नगरी उज्जयिनी की प्रशंसा देवताओं के सम्मुख की । देवताओं के मन में उज्जयिनी के दर्शन की इच्छा हुई । वे अपनेदृअपने विमान में चढ़कर उज्जयिनी आ पहुँचे । परन्तु उन्होंने देखा कि वहाँ जगहदृजगह शिवलिंग है और उनके पास शिव निर्माल्य के ढेर लगे हैं । शिवदृनिर्माल्य को लांघने से पाप होता है । इस पाप से बचने के लिए उन्होंने नीचे उतरने से लौट जाना ही उचित समझा । जब वे वापस लौटने लगे तो उन्होंने अपने आगे एक विमान में किसी यक्ष को जाते हुए देखा । उन्होंने यक्ष से पूछा कि वह कहाँ से आ रहा है । यक्ष ने बतलाया कि वह महाकाल की नगरी के दर्शन कर लौट रहा है । इस पर देवताओं ने उसे निर्माल्य के ढेर तथा उनको लांघने से उत्पन्न पाप की समस्या बतलाई । यक्ष ने उन्हें समझाया कि शिवलिंग के दर्शन के समय शिवदृनिर्माल्य को लांघकर पाप हो सकता हैए परन्तु उससे मोक्ष के लिए एक विशेष लिंग हैए उसके दर्शन से शिव निर्माल्य को लांघने का पाप नष्ट्र हो जाता है । यक्ष ने उन्हेंशिवलिंग के दर्शन कराए । जब देवता वापस आए । उन्होंने उज्जयिनी और उसमें स्थित शिवलिंगों के दर्शन किये तथा शिव निर्माल्य को लांघने के पाप से मोक्ष के लिए यक्ष के बतलाए शिवलिंग के अंत में दर्शन किये । यक्ष का नाम नागचण्ड था । अतएव वह शिवलिंग नागचण्डेश्वर ;क्रमांक 19 नागनाथ गलीद्ध कहलाया । उज्जैनमें स्थित चौरासी महादेव की सूची इस प्रकार है:
1/84 अगस्तेश्वर महादेव, 2/84 गुरिहश्वर महादेव, 3/84    ददेश्वर महादेव, 4/84 डमरूकेश्वर महादेव, 5/84 अनादिकल्पेश्वर महादेव, 6/84 स्वर्णलालेश्वर महादेव, 7/84 त्रिविष्ट्रपेश्वर महादेव, 8/84 कपालेश्वर महादेव 9/84 स्वर्गद्वारेश्वर महादेव, 10/84 कर्कोटेश्वर महादेव, 11/84 सिद्धेश्वर महादेवए 12ध/84 लोकपालेश्वर महादेव. 13/84    कामेश्वर महादेव, 14/84 कुटुम्बेश्वर महादेव,15/84 इन्द्रधम्नेश्वर महादेवए 16/84 ईशानेश्वर महादेव, 17ध्84 अप्सरेश्वर महादेवए18/84 कनकलेश्वर महादेवए 19/84    नागचन्द्रेश्वर महादेवए 20/84    प्रतिहारेश्वर महादेवए 21/84 कुक्कुटेश्वर महादेव, 22/84 कर्कटेश्वर महादेव, 231584    मेघनादेश्वर महादेवए 24/84    महालयेश्वर महादेवए 2584 मुक्तेश्वर महादेवए 26ध्84 सोमेश्वर महादेवए 2701884 अनर्केश्वर महादेवए 28कहा जाता है कि उज्जयिनी का प्रत्येक कंकर शंकर का स्वरूप है । भारत के सर्वज्ञात द्वादस ज्योतिर्लिंगों में से एक महालोकेश भगवान महाकालेश्वर तो यहाँ अनंतकाल से विराजित है । स्कन्दपुराण के अवंतिखण्ड में वर्णित चौरासी महादेव का अपना अलग ही माहात्म्य है । इस आलेख में इन्हीं की महिमा को संजोया गया है ।
    भारत में बारह स्थानों पर शिव के प्रधान लिंग है । उनमें से एक महाकाल का ज्योतिर्लिंग शिप्रा तट स्थित उज्जयिनी में है । महाकाल की इस नगरी का महत्व इसलिए भी है कि यहाँ पर पाँच वस्तु.श्मशानए उरवरए क्षेत्रए हरसिद्धि पीठ तथा वन एक ही स्थान पर हैए जो अन्यत्र दुर्लभ है । इस महा ज्योतिर्लिंग की स्थापना कब हुई इस विषय में इतिहास मौन है । उदयादित्य परमार ने महाकाल के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था । परमार युग के अंतिम दिनों में देवपाल के शासन काल में सन् 1235 ईण् में दिल्ली के दासवंशी सुलतान शमसुद्दीन अल्तमश ने महाकाल के मंदिर को तोड़ दिया था तथा यहाँ रखी विक्रमादित्य की सोने की मूर्ति को ले गया था । मराठा काल मेंराणोजी सिंधिया के दीवान रामचन्द्र बाबा शेणवी ने इस ध्वस्त महाकाल के मंदिर का जीर्णोद्धार किया तथा पुनः ज्योतिर्लिंगों की प्राणदृप्रतिष्ठा की ।
    महाकाल की नगरी के अतिरिक्त अनेक शिवलिंग है । उनमें से 84 लिंग का माहात्म्य माना गया है तथा उनका वर्णन स्कन्दपुराण के अवंतिका क्षेत्र माहात्म्य में अलग ही अध्याय में किया गया है । स्कन्द पुराण के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इन 84 महादेव में से क्रमांक 1 से 26 तक महाकाल के आसपास स्थित वन मेंए क्रमांंक 27 से 65 तक प्राचीन उज्जयिनी अर्थात् गढ़कालिकाए भैरवगढ़ तथा मकोड़िया आम क्षेत्र मेंए क्रमांक 65 से 71 तक शिप्रा तट पर क्रमांक 81 से 84 तक उज्जैननगरी के चारों द्वारों पर पूर्वए दक्षिणए पश्चिम तथा उत्तर में क्रमशः पिंगलेश्वरए कोकलाखेड़ीए अंबोदिया और जैथल में थेए परन्तु काल के थपेड़ों से इनमें से कई मंदिर नष्ट्र हो गये । मराठा काल में उन्हें अन्य स्थानों पर जैसे सिंहपुरीए कार्तिक चौकए दानीगेटए अनन्तपीठए खत्रीवाड़ाए सराफाए डाबरी आदि में स्थापित कर दिया गया ।
    एक बाद नारदजी स्वर्ग में गए । वहाँ बातचीत के सिलसिले में उन्होंने महाकाल की नगरी उज्जयिनी की प्रशंसा देवताओं के सम्मुख की । देवताओं के मन में उज्जयिनी के दर्शन की इच्छा हुई । वे अपनेदृअपने विमान में चढ़कर उज्जयिनी आ पहुँचे । परन्तु उन्होंने देखा कि वहाँ जगहदृजगह शिवलिंग है और उनके पास शिव निर्माल्य के ढेर लगे हैं । शिवदृनिर्माल्य को लांघने से पाप होता है । इस पाप से बचने के लिए उन्होंने नीचे उतरने से लौट जाना ही उचित समझा । जब वे वापस लौटने लगे तो उन्होंने अपने आगे एक विमान में किसी यक्ष को जाते हुए देखा । उन्होंने यक्ष से पूछा कि वह कहाँ से आ रहा है । यक्ष ने बतलाया कि वह महाकाल की नगरी के दर्शन कर लौट रहा है । इस पर देवताओं ने उसे निर्माल्य के ढेर तथा उनको लांघने से उत्पन्न पाप की समस्या बतलाई । यक्ष ने उन्हें समझाया कि शिवलिंग के दर्शन के समय शिवदृनिर्माल्य को लांघकर पाप हो सकता हैए परन्तु उससे मोक्ष के लिए एक विशेष लिंग हैए उसके दर्शन से शिव निर्माल्य को लांघने का पाप नष्ट्र हो जाता है । यक्ष ने उन्हेंशिवलिंग के दर्शन कराए । जब देवता वापस आए । उन्होंने उज्जयिनी और उसमें स्थित शिवलिंगों के दर्शन किये तथा शिव निर्माल्य को लांघने के पाप से मोक्ष के लिए यक्ष के बतलाए शिवलिंग के अंत में दर्शन किये । यक्ष का नाम नागचण्ड था । अतएव वह शिवलिंग नागचण्डेश्वर ;क्रमांक 19 नागनाथ गलीद्ध कहलाया । उज्जैनमें स्थित चौरासी महादेव की सूची इस प्रकार है:दृ
 
क्रमांक नाम क्रमांक नाम क्रमांक नाम
1/84 अगस्तेश्वर महादेव 29/84  रामेश्वर महादेव 57/84 घण्टेश्वर महादेव
2/84 गुरिहश्वर महादेव 30/84  च्यवनेश्वर महादेव 58/84 प्रयागेश्वर महादेव
3/84 ददेश्वर महादेव 31/84 खण्डेश्वर महादेव 59/84 सिद्धेश्वर महादेव
4/84 डमरूकेश्वर महादेव 32/84 पंतनेश्वर महादेव 60/84 मांतेश्वर महादेव
5/84 अनादिकल्पेश्वर महादेव 33/84 आनन्देश्वर महादेव 61/84 सौभागेश्वर महादेव
6/84 स्वर्णलालेश्वर महादेव 34/84 कंधेडेश्वर महादेव 62/84 रूपेश्वर महादेव
7/84 त्रिविष्ट्रपेश्वर महादेव 35/84 इन्द्रेश्वर महादेव 63/84 सहद्धघनुकारेश्वर महादेव
8/84 कपालेश्वर महादेव 36/84 मार्कण्डेश्वर महादेव 64/84 पशुपश्वर महादेव
9/84 स्वर्गद्वारेश्वर महादेव 37/84 एशिवेश्वर महादेव 65/84 ब्रह्मेश्वर महादेव
10/84 कर्कोटेश्वर महादेव 38/84 कुसुमेश्वर महादेव 66/84 जल्पेश्वर महादेव
11/84 सिद्धेश्वर महादेव 39/84 अंकुरेश्वर महादेव 67/84 केदारेश्वर महादेव
 12/84 लोकपालेश्वर महादेव 40/84 कुण्डेश्वर महादेव 68/84 पिशामुक्तेश्वर महादेव
13/84 कामेश्वर महादेव 41/84 लुम्पेश्वर महादेव 69/84 संगमेश्वर महादेव
14/84 कुटुम्बेश्वर महादेव 42/84 गंगेश्वर महादेव 70/84 दुद्धेश्वर महादेव
15/84 इन्द्रधम्नेश्वर महादेव 43/84 अंगारकेश्वर महादेव 71/84 याज्ञेश्वर महादेव
16/84 ईशानेश्वर महादेव 44/84  उत्तरेश्वर महादेव 72/84  चन्द्रदित्येश्वर महादेव
17/84 अप्सरेश्वर महादेव 45/84 त्रिलोचनेश्वर महादेव 73/84 करभेश्वर महादेव
18/84 कनकलेश्वर महादेव 46/84 वीरेश्वर महादेव 74/84 राजस्थलेश्वर महादेव
19/84     नागचन्द्रेश्वर महादेव 47/84 नृपरेश्वर महादेव 75/84 बड़लेश्वर महादेव
20/84  प्रतिहारेश्वर महादेव 48/84 अभयेश्वर महादेव 76/84  अरुणेश्वर महादेव
21/84 कुक्कुटेश्वर महादेव 49/84 पृथुकेश्वर महादेव 77/84 पुष्पदंतेश्वर महादेव
22/84  कर्कटेश्वर महादेव 50/84  स्थावेश्वर महादेव 78/84 अभिमुक्तेश्वर महादेव
23/84    मेघनादेश्वर महादेव 51/84 शूलेश्वर महादेव 79/84   हनुमन्तेश्वर महादेव
24/84  महालयेश्वर महादेव 52/84 ओंकारेश्वर महादेव 80/84 स्वप्नेश्वर महादेव
25/84 मुक्तेश्वर महादेव 53/84 विश्वरेश्वर महादेव 81/84 पिंगलेश्वर महादेव
26/84 सोमेश्वर महादेव 54/84 कण्ठेश्वर महादेव 82/84 कायावरोहणेश्वर महादेव
27/84 अनर्केश्वर महादेव 55/84 सिंहेश्वर महादेवए 83/84 बिल्केश्वर महादेव
28/84 जटेश्वर महादेव 56/84 रेवंतेश्वर महादेव 84/84 ददुरेश्वर महादेव

 

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