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सिंहस्थ कुंभ का इतिहास एवं संदर्भ वैदिक काल से आज तक

Post By : Dastak Admin on 25-Jun-2016 11:00:41

ujjain, simhastha


उज्जैन। 24 जून 2016/ सिंहस्थ कुंभ के संबंध में सबसे पुराना वर्णन वेदों में मिलता है, जिनका काल इतिहासकार लगभग 3000 ईसा पूर्व से 9000 ईसा पूर्व तक मानते हैं। इसके बाद पुराणों में सिंहस्थ कुंभ का विस्तृत विवरण आया है, पुराणों का काल इतिहासकार लगभग 200 ईसा पूर्व से 400 ईसवी सन् तक मानते हैं। गुप्तकाल में भी सिंहस्थ के आयोजन का उल्लेख मिलता है। सातवीं शताब्दी में भारत आए बौद्ध तीर्थ यात्री हृवेन सांग यात्रा काल 629-643 के यात्रा वृतांत में सम्राट हर्षवर्धन 590-647 के शासनकाल 606-647 में कुंभ के आयोजन का उल्लेख मिलता है। आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य 788-820 की अपने शिष्यों को संगम के किनारे कुंभ पर्व के आयोजन के संबंध चर्चा का उल्लेख मिलता है। वर्ष 1732 से लगातार सिंहस्थ कुंभ के आयोजन का उल्लेख इतिहास में यत्र तत्र प्राप्त होता है।

वेदों में में सिंहस्थ कुंभ
सर्वप्रथम हमें वेदों में सिंहस्थ कुंभ का उल्लेख प्राप्त होता है-
जघानवृत्रं स्वधितिर्वनेव स्वरोज पुरो अरदन्न सिन्धून् ।
बिभेद गिरि नव वभिन्न कुम्भभा गा इन्द्रो अकृणुत स्वयुग्भि: ।।
                                                   (ऋग्वेद 10। 89। 7)        
    कुंभ-पर्व में जाने वाला मनुष्य स्वयं दान-होमादि सत्कर्मो के फलस्वरूप अपने पापों को वैसे ही नष्ट करता है जैसे कुठार वन को काट देता है। जैसे गंगा अपने तटों को काटती हुई प्रवाहित होती है, उसी प्रकार कुम्भ-पर्व मनुष्य के पूर्व पापों को नष्ट करता है और नूतन (कच्चे) घड़े की तरह बादल को नष्ट-भ्रष्ट कर संसार में सुवृष्टि प्रदान करता है।

        कुम्भी वेद्यां मा व्यथिष्ठा यज्ञायुधैराज्येनातिषित्का"
                                                  (ऋग्वेद)
    हे कुम्भ-पर्व। तुम यज्ञीय वेदी में यज्ञीय आयुधों से घृत द्वारा तृप्त होने के कारण कष्टानुभव मत करो।

        युवं नरा स्तुवते पज्रि़याय कक्षीवते अरदतं पुरंधिम् ।
        कारोतराच्छफादश्र्वस्य वृष्ण: शतं कुम्भाँ असिंचतसुराया : ।।
                                  (ऋग्वेद 1। 116। 7)
        कुम्भो वनिष्टुर्जनिता शचीभिर्यस्मिन्नग्रे योन्यांगर्भो अन्त:  ।
        प्लाशिव्र्यक्त: शतधारउत्सो दुहे न कुम्भी स्वधां पितृभ्य:   ।।
                                    (शुक्ल यजुर्वेद 19 । 87)        
    कुम्भ-पर्व सत्कर्म के द्वारा मनुष्य को इस लोक में शारीरिक सुख देने वाला और जन्मान्तरों में उत्कृष्ट सुखों का देने वाला है ।
        आविशन्कलशूँ सुतो विश्र्वा अर्षन्नभिश्रिय:। इन्दूरिन्द्रायधीयते ।।
                             (सामवेद पू. 6/3)    
        पूर्ण कुम्भोच्धि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा न सन्त: ।
        स इमा विश्र्वा भुवनानिप्रत्यकालं तमाहु: परमे व्योमन ।।
                            (अथर्ववेद 19/53/3)
    हे सन्तगण ! पूर्णकुम्भ बारह वर्ष के बाद आया करता है, जिसे हम अनेक बार प्रयागादि तीर्थो में देखा करते हैं। कुम्भ उस समय को कहते हैं जो महान् आकाश में ग्रह-राशि आदि के योग से होता है।
        चतुर: कुम्भांश्र्चतुर्धा ददामि ।
                                              (अथर्ववेद 4/34/7)     
    ब्राह्मण कहते हैं- हे मनुष्यों !  मैं तुम्हें ऐहिक तथा आयुष्मिक सुखों को देने वाले चार कुम्भ पर्वो  का निर्माण कर चार स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में प्रदान करता हूँ।
        कुम्भीका दूषीका: पीयकान् ।
                                          (अथर्ववेद 16/6/8)    

पुराणों में सिंहस्थ कुंभ
पुराणों में सिंहस्थ के संबंध में विभिन्न कथाएं हमें प्राप्त होती हैं जिनमें देव दानव संग्राम, अमृत मंथन, अमृत वितरण तथा चार स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन में अमृत बूंदों के गिरने तथा इन स्थानों पर कुंभ के आयोजन का उल्लेख है।
विष्णुपुराण में सिंहस्थ की महिमा का उल्लेख आता है-
सहस्त्रं कार्तिके स्नानं, माघे स्नानं शतानिच।
वैशाखे नर्मदा कोटि, कुंभ स्नानेन तत्फलम्॥
अर्थात हजारों स्नान कार्तिक में, सैकड़ों स्नान माघ मास में किए हों तथा करोड़ों बार वैशाख में नर्मदा स्नान से जो पुण्य प्राप्त होता है वही पुण्य एक बार कुंभ पर्व में स्नान करने से प्राप्त होता है।
अश्वमेघशहस्त्राणि, वाजपेयशतानि च।
लक्ष प्रदक्षिणा भूम्या: कुंभस्नाने तत्फलम्।
    अर्थात हजारों अश्वमेघ, सैकड़ों वाजपेय यज्ञ कराने में तथा लाखों प्रदक्षिणा पृथ्वी की करने में जो फल मिलता है, वह कुभ पर्व के स्नान मात्र से मिलता है।
    स्कंद पुराण में उल्लेख आता है कि-
माघवे धवले पक्षे सिंह जीवेत्वजे रवौ।
तुलाराशि निशानाथे स्वातिभे पूर्णिमा तिथौ॥
व्यतिपाते तु सम्प्राप्ते चंद्रवासर-संयुते।
कुश स्थली महाक्षेत्रे स्नाने मोक्षमाप्नुयात॥
    अर्थात जब वैशाख मास हो, शुक्लपक्ष हो और बृहस्पति सिंह राशि पर,सूर्य मेष राशि पर तथा चंद्रमा तुला राशि पर हो, साथ ही स्वाति नक्षत्र, पूर्णिमा तिथि, व्यतिपात योग और सोमवार को दिन हो, तो उज्जैन में क्षिप्रा स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मराठों के शासन काल में सिंहस्थ
ईस्वी सन् 1730-31 में मालवा प्रान्त पर मराठों का आधिपत्य हुआ तथा सिंधिया (शिन्दे) राजवंश के संस्थापक, तत्कालीन राजधानी उज्जैन के महाराजा श्री राणोजी शिन्दे की आज्ञा से सन् 1732 ईस्वी में कर्मवीर दीवान बाबा श्रीराम चन्द्रराव खुखटनकर ने वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को उज्जैन में सिंहस्थ कुम्भ पर्व का आयोजन किया तथा उसके बाद से सिंहस्थ कुम्भ पर शिन्देसाही की ओर से मेले का समस्त प्रबंध होता रहा। इसके 2 वर्ष बाद सन्‍ 1734 में राणोजी सिंधिया के दीवान रामचंद्र शेणवी ने श्री महाकालेश्वर मंदिर का जीणोद्धार कराया था तथा तभी से इस मंदिर में नियमित पूजन-अर्चन की व्यवस्था राज्य की ओर से की जाने लगी। महाकालेश्वर की महिमा बढ़ने के साथ ही सिंहस्थ कुंभ का महत्व भी उत्तरोत्तर बढ़ने लगा।
सन् 1732 के 11 वर्ष बाद सन् 1743 में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया गया। इसके 12-12 वर्ष बाद सिंहस्थ कुंभ का आयोजन सन् 1755 एवं सन् 1767 में किया गया। सन् 1779 के 11 वर्ष बाद 1790 में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन हुआ। इसके बाद 12-12 वर्षों के अंतराल से वर्ष 1802, 1814, 1826 तथा 1838 में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया गया।
सन् 1838 ईस्वी (वि.सं. 1895) के सिंहस्थ पर्व पर वैष्णवों व सन्यासियों में भयंकर लड़ाई हुई जिसमें दोनों तरफ से बड़ी संख्या में महात्मा मारे गये। वैष्णवों द्वारा लक्खीघाट स्थित नागाओं के मठ, जिसमें भगवान श्री दत्तात्रेयजी का स्वर्णमण्डित मन्दिर था, को लूट लिया गया। प्रत्युत्तर में सन्यासियों द्वारा वैष्णवों के अखाड़े लूट लिये गये। इसके बाद सन्यासियों द्वारा उज्जैन के कुम्भ का त्याग कर दिया गया, किन्तु बाद में बड़वाई (इन्दौर) में चतुर्मास कर रहे जूना अखाड़े के रमता पंच के श्रीमहन्त रामगिरिजी 14 मढ़ी व अन्य श्री महन्तों से महाराजा शिवाजीराव होल्कर ने उज्जैन कुम्भ चालू करने की प्रार्थना की तथा अन्य अखाड़ों के श्रीमहन्तों को व महाराजा माधवराव शिन्दे आदि को बुलाकर निश्चय किया कि त्रयम्ब का कुम्भ कर दिनांक 5 मई सन् 1909 ईस्वी को सिंहस्थ कुम्भ उज्जैन में मनाया जायेगा और इस प्रकार उज्जैन का कुम्भ पुन: प्रारम्भ हुआ। यद्यपि इस अंतराल में भी किसी न किसी रूप में सिंहस्थ का आयोजन किया जाता रहा होगा।

20 वीं सदी में सिंहस्थ कुंभ
सन् 1909 में सिंहस्थ का पुन: प्राचीन महिमा के साथ आयोजन हुआ। सन् 1921 ई. के सिंहस्थ के शाही स्नान वैशाख पूर्णिमा दिनांक 21 मई शनिवार के दिन स्नान के समय ही महामारी का भयंकर प्रकोप हुआ, जिसमें हजारों लोग व साधु मृत्यु को प्राप्त हुए। शासन द्वारा तत्काल नगर खाली करने का ऐलान किया गया और लोगों को, जो भी साधन प्राप्त हुआ उससे बाहर भेजा गया।
सन् 1933 ईस्वी में दिनांक 9 मई (वैशाख पूर्णिमा, मंगलवार, वि.सं. 1990) को शाही स्नान हुआ। सन् 1945 ईस्वी में दिनांक 27 मई रविवार (वैशाख पूर्णिमा वि.सं. 2002) को, सन् 1957 ईस्वी में दिनांक 13 मई सोमवार (वैशाख पूर्णिमा वि.सं. 2014) को, सन् 1969 ईस्वी दिनांक 2 मई सोमवार (वैशाख पूर्णिमा वि.सं. 2026) को तथा सन् 1980 ईस्वी में दिनांक 10 अप्रैल बुधवार (वैशाख पूर्णिमा वि.सं. 2037) को एक ही शाही स्नान कुम्भ पर्व का हुआ।
सन् 1732 ई. से सन् 1933 ई. तक के हर सिंहस्थ कुम्भ पर सिंधिया राज्य (ग्वालियर स्टेट) की तरफ से परम्परा रही कि सिंहस्थ पर्व के 3-4 वर्ष पूर्व ही उज्जैन के ज्योतिषियों से सिंहस्थ पर्व के समय, सम्वत, तिथि आदि का निर्णय करवाकर प्रयागराज के कुम्भ अवसर पर वहाँ एकत्रित अखाड़ों को विधिवत् आमंत्रित किया जाता था तथा पर्व की एक माह की अवधि में 15 दिन तक समस्त अखाड़ों, जमातों व साधु-सन्तों के भोजन की व्यवस्था राज्य की तरफ से की जाती थी तथा शेष दिनों की व्यवस्था उज्जैन की धार्मिक जनता करती थी। पर्व की समाप्ति पर राज्य की ओर से समस्त साधु-सन्तों को उनकी पद गरिमानुसार शाल, भेंट आदि से सम्मानित किया जाता था। यह व्यवस्था सन् 1933 ई. के सिंहस्थ कुम्भ तक बराबर चली।
 सन् 1945 ई. के सिंहस्थ कुम्भ पर्व को न मनाये जाने का सिंधिया राज्य ग्वालियर स्टेट द्वारा आदेश निकाला गया, किन्तु साधु-सन्तों व उज्जैन की धार्मिक जनता ने इस आदेश को स्वीकार नहीं किया और सिंहस्थ कुम्भ मनाया गया। स्टेट द्वारा व्यवस्था न किए जाने पर उसकी बजाय 15 दिन की व्यवस्था श्री दत्त अखाड़े गादीपति श्रीमहन्त पीर श्री सन्ध्यापुरीजी महाराज ने की तथा 15 दिन की उज्जैन के धार्मिक भक्तगणों द्वारा व्यवस्था की गयी।
इसके पश्चात् सन् 1956-57 ई. के सिंहस्थ कुम्भ को लेकर श्री करपात्रीजी एवं दण्डी स्वामी तथा अखाड़ों के मध्य विवाद चला, किन्तु षट्दर्शन अखाड़ों ने 1957 ई. में ही सिंहस्थ मनाया। इसी प्रकार सन् 1967-68 ई. के सिंहस्थ कुम्भ को लेकर वैष्णव अखाड़ों व सन्यासी अखाड़ों में विवाद रहा, जिसके फलस्वरूप वैष्णव अखाड़ों ने 1968 में सिंहस्थ मनाया तथा अन्य सभी षट्दर्शन अखाड़ों (सन्यासी, उदासीन तथा निर्मल) ने सन् 1969 ई. में सिंहस्थ कुम्भ मनाया। सन्‍ 1980 एवं 1992 में सिंहस्थ कुंभ पवर्‍ पूरी गरिमा के साथ आयोजित हुए।
21 वीं सदी के सिंहस्थ
21 वीं सदी का पहला सिंहस्थ वर्ष 2004 में आयोजित किया गया। इसकी एक विशेषता यह रही कि सन् 2004 के कुम्भ के अवसर पर पहली बार तीन शाही स्नान 5 अप्रैल, 22 अप्रैल एवं 4 मई को आयोजित हुए। इस सदी का दूसरा सिंहस्थ वर्ष 2016 में 22 अप्रेल से 21 मई तक आयोजित हुआ जिसमें तीन शाही स्नान 22 अप्रेल, 9 मई एवं 21 मई को आयोजित हुए। यह सिंहस्थ सभी सिंहस्थों में इसलिए अनूठा था कि इसमें व्यापक पैमाने पर व्यवस्थाओं में आधुनिक विज्ञान एवं तकनीकी का उपयोग हुआ तथा विश्व के सभी आयोजनों के रिर्कार्ड तोड़ते हुए एक ही नदी के किनारे लगभग 8 करोड़ श्रद्धालुओं ने एक नियत समयावधि में स्नान किया।

 

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